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25 दिन 25 कहानियां: आवा गुरु, इहंवा बइठा... पहले यही बनारस था, अब थोड़ा फुर्सत खो रहा

Tue, 19 May 2026 10:24 AM IST
Pragati Chand अमर उजाला नेटवर्क, वाराणसी।

सार

Varanasi News: बीएचयू के पूर्व छात्र अमन सिंह गौर बताते हैं कि एक दौर था जब बनारस सिर्फ मंदिरों, घाटों और गलियों का शहर नहीं था, बल्कि फुर्सत का भी शहर था। 
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अमन सिंह गौर - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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घाट वही हैं, सीढ़ियां वही हैं, गंगा वही है, लेकिन वहां बैठने का ढंग बदल गया है। अब लोग घाट पर बैठकर समय बिताने कम, समय दिखाने ज्यादा आते हैं। पहले तस्वीरें याद के लिए ली जाती थीं, अब पोस्ट के लिए। पहले दोस्त बनते थे, अब फॉलोअर। चाय की दुकानों पर बहसें थोड़ी कम हुई हैं और स्क्रीन की रोशनी थोड़ी ज्यादा बढ़ गई है। भीड़ पहले से कहीं ज्यादा है, लेकिन बातचीत थोड़ी कम सुनाई देती है। यह बदलाव सिर्फ बनारस का नहीं, पूरे समय का है...।

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एक दौर था जब बनारस सिर्फ मंदिरों, घाटों और गलियों का शहर नहीं था, बल्कि फुर्सत का भी शहर था। यहां लोग सिर्फ काम से नहीं निकलते थे, बेवजह भी निकल पड़ते थे। किसी को कहीं पहुंचने की जल्दी नहीं होती थी। शाम ढलते ही कदम अपने आप अस्सी, लंका, वीटी और घाटों की ओर बढ़ जाते थे। तब बनारस में मिलना तय नहीं होता था, हो जाता था। घाटों की सीढ़ियां और आसपास की चाय की दुकानें किसी अनौपचारिक संसद से कम नहीं थीं। कहीं राजनीति पर बहस चल रही है, कहीं रिसर्च स्कॉलर अपने गाइड को कोस रहे हैं। कोई प्रेम में असफल होकर दर्शनशास्त्र झाड़ रहा है, तो कोई कविता सुनाकर शाम को और लंबा कर देना चाहता है। पांच मिनट खड़े रह जाइए, कोई न कोई जरूर आवाज देता आवा गुरु, इहंवा बइठा... यही बनारस था, जहां पहचान बनने में वक्त नहीं लगता था।

अस्सी घाट तब सिर्फ पर्यटन स्थल नहीं था। यह शहर का सार्वजनिक बैठक खाना था। कोई अखबार लेकर बैठा है, कोई गंगा को निहारते हुए चुप है, तो कोई बिना पूछे जीवन का सार समझाने को तैयार। घाट पर बैठे बुजुर्ग, चाय वाले की आवाजें, नावों की हलचल और गंगा के सामने पसरा ठहराव सब मिलकर ऐसा माहौल बनाते थे कि मन अपने आप हल्का हो जाता था।

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बनारस की इस फुर्सत को समझना हो तो बीएचयू की शामों को देखना चाहिए। लंका से लेकर विश्वनाथ मंदिर तक जाती सड़कें, हॉस्टलों के बाहर चाय की दुकानों पर जमीं महफिलें, विभागों के बाहर घंटों चलने वाली बहसें सब इस शहर की उसी धीमी संस्कृति के हिस्सा थे। यहां पढ़ाई सिर्फ क्लासरूम में नहीं होती थी, बल्कि चाय के कुल्हड़ों, हॉस्टल के कमरों और लंबी टहलती शामों में भी होती थी। तब मोबाइल जेब में रहता था, हाथ में नहीं। लोग स्क्रीन कम, चेहरे ज्यादा देखते थे। चाय की दुकानों पर उधार चलता था और भरोसा भी। कई जगह रुपये बाद में देने की बात पर सिर्फ मुस्कान मिलती थी। बनारस का हिसाब अलग था। यहां गणित से ज्यादा पहचान चलती थी। भीड़ बहुत होती थी, लेकिन कोई अकेला नहीं लगता था। बनारस की सबसे बड़ी खूबी यही थी कि यहां अकेलापन भी सामाजिक हो जाता था।

फिर धीरे-धीरे शहर बदला। घाट वही हैं, सीढ़ियां वही हैं, गंगा वही है, लेकिन वहां बैठने का ढंग बदल गया है। अब लोग घाट पर बैठकर समय बिताने कम, समय दिखाने ज्यादा आते हैं। पहले तस्वीरें याद के लिए ली जाती थीं, अब पोस्ट के लिए। पहले दोस्त बनते थे, अब फॉलोअर।

चाय की दुकानों पर बहसें थोड़ी कम हुई हैं और स्क्रीन की रोशनी थोड़ी ज्यादा बढ़ गई है। भीड़ पहले से कहीं ज्यादा है, लेकिन बातचीत थोड़ी कम सुनाई देती है। यह बदलाव सिर्फ बनारस का नहीं, पूरे समय का है। लेकिन शिकायत बनारस से इसलिए ज्यादा होती है, क्योंकि इस शहर से उम्मीदें भी ज्यादा रही हैं। यह शहर हमेशा भागती दुनिया के बीच एक धीमी जगह रहा, जहां आदमी थोड़ी देर के लिए खुद से मिल सकता था। आज भी अस्सी की हवा वही है, गंगा भी उसी धैर्य से बह रही है। बस इंतजार इस बात का है कि शायद किसी दिन बनारस फिर थोड़ा धीमा हो जाए। जहां चाय थोड़ी फीकी हो सकती थी, लेकिन बातचीत हमेशा मीठी होती थी। -अमन सिंह गौर, पूर्व छात्र, परास्नातक, इतिहास विभाग, बीएचयू
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