हरगांव। गुड़ बेलों के धुएं से इलाके की आबोहवा बिगड़ रही है। इससे लोगों में सांस लेने में दिक्कत के साथ ही आंखों में जलन की समस्या बढ़ रही है। हरगांव विकास खंड क्षेत्र में सैकड़ों गुड़ बेलें मनमाने तरीके से संचालित की जा रही हैं। मानकों की अनदेखी कर संचालित गुड़ बेलें लोगों के स्वास्थ्य और पर्यावरण को नुकसान पहुंचा रही हैं। इनसे निकलने वाला धुआं प्रदूषण बढ़ाने के साथ ही आबोहवा भी बिगाड़ रहा है।
वर्तमान समय में गुड़ बेलें केवल औद्योगिक गतिविधि तक सीमित नहीं है बल्कि गंभीर स्वास्थ्य और पर्यावरणीय संकट का रूप ले चुकी हैं। लखीमपुर–सीतापुर मार्ग के झरेखापुर इलाके से लेकर हरगांव–महोली मार्ग तक सैकड़ों की संख्या में गुड़बेलें संचालित हैं। इनकी चिमनी केवल कहने भर की होती हैं। करीब 10 से 12 फीट की चिमनी से निकलने वाला धुआं आसपास इलाके में फैलता रहता है। इससे वातावरण में दिन भर छाई रहने वाली धुएं की चादर हवा में प्रदूषण बढ़ा रही है।
क्षेत्रीय लोगों का कहना है कि इससे बच्चों, बुजुर्गों और बीमार व्यक्तियों को सांस लेने में दिक्कत होने लगी है। खांसी, आंखों में जलन, एलर्जी और सांस संबंधी रोगी भी इलाके में तेजी से बढ़ने लगे हैं। सेमरीभान निवासी अजमत ने बताया कि अधिकांश समय काले धुएं के कारण सड़क पर निकलना मुहाल हो जाता है। कल्लापुर निवासी बड़े सिंह ने बताया कि गुड़बेल से निकलने वाले धुएं से आंखों में जलन के साथ सांस लेने में तकलीफ की परेशानी भी काफी बढ़ गई है। लगातार शिकायत के बाद भी शासन-प्रशासन इस गंभीर समस्या की रोकथाम को लेकर उदासीन बना है।
पर्यावरणीय नुकसान भी कम गंभीर नहीं
धुएं से पर्यावरणीय नुकसान भी कम गंभीर नहीं हैं। गुड़बेलों द्वारा भूजल का अत्यधिक दोहन किया जा रहा है।इस्तेमाल किया गया दूषित पानी बिना किसी शोधन के आसपास के गड्ढों में छोड़ा जा रहा है, इससे जल स्रोतों के प्रदूषित होने कर खतरा बढ़ गया है। यह स्थिति भविष्य में पेयजल संकट को प्रभावित कर सकती है।
गंभीर बीमारियां फैलने का खतरा
गुड़ बेल के धुंए का प्रदूषण स्वच्छ हवा को नुकसान पहुंचाने के साथ फेफड़ों और एलर्जी से संबंधित गंभीर बीमारियों का कारण बन सकता है। खास तौर पर सांस रोगियों को अत्यधिक समस्या हो सकती है।
डॉ. राजीव राठौर, सीएचसी हरगांव