इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि महज टाइपिंग की त्रुटि के आधार पर पत्नी और बच्चे की ओर से दाखिल गुजारा भत्ता की अर्जी खारिज नहीं की जा सकती है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सुभाष चंद्र शर्मा की अदालत ने मुजफ्फरनगर पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया।
इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि महज टाइपिंग की त्रुटि के आधार पर पत्नी और बच्चे की ओर से दाखिल गुजारा भत्ता की अर्जी खारिज नहीं की जा सकती है। इस टिप्पणी संग न्यायमूर्ति सुभाष चंद्र शर्मा की अदालत ने मुजफ्फरनगर पारिवारिक न्यायालय के आदेश को रद्द कर दिया। साथ ही मामले को दोबारा सुनवाई के लिए ट्रायल कोर्ट भेज दिया। याची ने पति के खिलाफ खुद व बच्चे के लिए गुजारा भत्ता की मांग को लेकर पारिवारिक न्यायालय में अर्जी दाखिल की थी।
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कोर्ट ने अर्जी यह कहते हुए खारिज दी कि बच्चे के अभिभावक का नाम स्मिता मिनाक्षी लिखा गया है जबकि मां का नाम स्मिता आर्टी है। हाईकोर्ट ने कहा कि यह सिर्फ टाइपिंग की गलती है। ट्रायल कोर्ट ने मामले के मेरिट (सार) पर विचार ही नहीं किया जबकि आर्टी ने बतौर गवाह शपथपत्र और बयान भी दाखिल किया था जिसे पति की ओर से चुनौती नहीं दी गई। इसके बावजूद आवेदन को केवल तकनीकी आधार पर खारिज करना अनुचित और गैरकानूनी है।