फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

High Court : वरासत की जंग- चचेरे भाई की गवाही ने पलटा पासा, हाईकोर्ट ने विधवा का दावा नकारा

Fri, 27 Feb 2026 03:00 PM IST
विनोद सिंह अमर उजाला नेटवर्क, प्रयागराज

सार

लाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती जिले के एक दशक पुराने भूमि विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि कोई महिला पति की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह कर लेती है तो वह पूर्व पति की संपत्ति पर वरासत का अधिकार खो देती है।
Register For Event
विज्ञापन
कोर्ट का आदेश। - फोटो : अमर उजाला।
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

लाहाबाद हाईकोर्ट ने बस्ती जिले के एक दशक पुराने भूमि विवाद में बड़ा फैसला सुनाते हुए कहा कि यदि कोई महिला पति की मृत्यु के बाद पुनर्विवाह कर लेती है तो वह पूर्व पति की संपत्ति पर वरासत का अधिकार खो देती है। न्यायमूर्ति चंद्र कुमार राय की एकल पीठ ने जैजुला की याचिका खारिज करते हुए भांजे (हबीबुल्लाह) के पक्ष में वरासत दर्ज करने के बंदोबस्त अधिकारी के फैसले को सही ठहराया।

विज्ञापन


चूड़ियां और निकाह पर चुप्पी बड़ा साक्ष्य

सुनवाई के दौरान अदालत ने पाया कि याची जैजुला ने कोर्ट में कुरान उठाकर यह कहने से इन्कार कर दिया था कि उसने दूसरा निकाह नहीं किया है। कोर्ट ने अपने निर्णय में तल्ख लहजे में कहा मुस्लिम समाज में विधवाएं आमतौर पर चूड़ियां नहीं पहनतीं, लेकिन याची का चूड़ियां पहनना और निकाह के सवाल पर शपथ लेने से कतराना इस बात का पुख्ता संकेत है कि उसने पुनर्विवाह कर लिया था। लिहाजा, वह अपने पहले पति की कानूनी वारिस नहीं रह जाती।

गवाह की भूमिका

नातेदारी पर चचेरे भाई का बयान सर्वोपरि

मामले में मृतक लियाकत हुसैन के चचेरे भाई मोहम्मद जुबैर की गवाही निर्णायक साबित हुई। उन्होंने कोर्ट को बताया कि लियाकत ने अपनी मृत्यु से पहले ही जैजुला को तलाक दे दिया था, जिसके बाद जुबैर ने खुद उससे निकाह किया और बाद में उसे भी तलाक दे दिया। कोर्ट ने भारतीय साक्ष्य अधिनियम-1872 की धारा 50 का हवाला देते हुए कहा कि जब अदालत को किसी नातेदारी के बारे में राय बनानी हो तो उस व्यक्ति की राय सबसे सुसंगत होती है, जिसे उस परिवार के बारे में विशेष ज्ञान हो। चचेरे भाई का बयान यहां पत्थर की लकीर है।
विज्ञापन


चकबंदी प्रक्रिया पर स्पष्टीकरण

याची के वकीलों ने तकनीकी आपत्ति उठाई थी कि विपक्षी (हबीबुल्लाह) ने धारा-12 के तहत अलग से आवेदन नहीं दिया था, केवल आपत्ति दाखिल की थी। इस पर हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि चकबंदी अधिनियम में प्लीडिंग के नियम इतने कड़े नहीं हैं। यदि किसी ने अपनी आपत्ति में वंशावली दी है। नाम दर्ज करने की प्रार्थना की है तो उसे उचित कानूनी कार्यवाही माना जाएगा। लिहाजा, कोर्ट ने माना कि उप-संचालक चकबंदी, बंदोबस्त अधिकारी ने मौखिक और दस्तावेजी साक्ष्यों का सही विश्लेषण किया है। इसी के साथ जैजुला की 1982 से लंबित याचिका को खारिज कर दिया गया और हबीबुल्लाह को असली वारिस माना गया।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें