सनातन धर्म में सभी वैदिक कार्यों में शंख का विशेष स्थान है,इसके बिना कोई भी पूजा सम्पन्न नहीं होती। सुख-समृद्धि एवं सौभाग्यदायी शंख को भारतीय संस्कृति में मांगलिक चिह्न के रूप में स्वीकार किया गया है। शंख भगवान विष्णु का प्रमुख आयुध है। शंख की ध्वनि आध्यात्मिक शक्ति से संपन्न होती है। शास्त्रों के अनुसार शंख की उत्पत्ति शंखचूर्ण की हड्डियों से हुई है, इसलिए इसे पवित्र वस्तुओं में परम पवित्र व मंगलों के भी मंगल माना गया है।
शंख का जल और शंखध्वनि का पुण्य प्रभाव
धार्मिक अनुष्ठान और महाभारत में शंख
विजय का प्रतीक माने जाने वाले शंख से किसी भी धार्मिक अनुष्ठान के आरम्भ में शंखध्वनि की जाती है। इसकी ध्वनि जहाँ तक पहुँचती है, वहाँ तक के वातावरण में रहने वाले सभी कीटाणु नष्ट हो जाते हैं, ऐसा शोधों से भी स्पष्ट हुआ है। शंख का जल सभी को पवित्र करने वाला माना गया है, इसी वजह से आरती के बाद श्रद्धालुओं पर शंख से जल छिड़का जाता है। महाभारत युद्ध में भगवान श्रीकृष्ण ने पांचजन्य शंख, अर्जुन ने देवदत्त और भीम ने पौंड्रक नामक बड़े शंख बजाए। वहीं युधिष्ठिर ने अनंतविजय, नकुल ने सुघोष और सहदेव ने मणिपुष्पक शंख को बजाकर युद्ध का उद्घोष किया।