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हिमाचल प्रदेश: मजदूरों की कमी से परेशान शिमला के बागवान ने निकाला रास्ता, अब मोनोरेल से ढोएगा 500 किलो सेब

Fri, 09 Oct 2026 12:21 PM IST
Ankesh Dogra संवाद न्यूज एजेंसी, शिमला।

सार

हिमाचल प्रदेश में सेब के बगीचों में मजदूरों की कमी से परेशान बागवान अब नए तरीके अपना रहे हैं। शिमला के कोटखाई में सुनील चौहान ने अपने बगीचे में 100 मीटर लंबी मोनोरेल लगाई है। करीब 4.20 लाख रुपये की लागत से तैयार यह व्यवस्था एक बार में 500 किलो सेब ढो सकती है। सफल परीक्षण के बाद अब अगले सेब सीजन में इससे ढुलाई करने की तैयारी है।

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मजदूर नहीं मिले तो निकाला नया रास्ता! - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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हिमाचल प्रदेश में सेब की फसल तैयार करना जितना मेहनत का काम है, उसे बगीचे से स्टोर तक पहुंचाना भी उतना ही मुश्किल है। पहाड़ी ढलानों पर बसे बगीचों में सेब की पेटियां उठाकर ले जाने के लिए मजदूरों की जरूरत पड़ती है। लेकिन सेब सीजन में मजदूर आसानी से नहीं मिलते। ऐसे में शिमला जिले के कोटखाई के एक बागवान ने इसका नया रास्ता निकाला है।

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ढांगवी गांव के बागवान सुनील चौहान ने अपने बगीचे में मोनोरेल लगाई है। अब सेब की पेटियां ढलानदार जमीन से स्टोर तक पहुंचाने के लिए उन्हें पूरी तरह मजदूरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा। इस व्यवस्था का सफल परीक्षण भी किया जा चुका है।

100 मीटर लंबा ट्रैक, एक बार में 500 किलो सेब
सुनील चौहान ने अपने बगीचे में 100 मीटर लंबा मोनोरेल ट्रैक तैयार करवाया है। इसमें नौ हॉर्स पावर का इंजन लगाया गया है। बागवान के मुताबिक, यह मोनोरेल एक बार में करीब 500 किलो सेब ले जा सकती है। खास बात यह है कि उनके अनुसार, यह 45 डिग्री तक की ढलान पर भी काम कर सकती है। इससे उन बगीचों में सेब की ढुलाई आसान होने की उम्मीद है, जहां सड़क बनाना मुश्किल होता है।

मोनोरेल लगाने में खर्च हुए 4.20 लाख रुपये
इस मोनोरेल को तैयार करने के लिए सुनील चौहान ने चीन के ग्वांगझोउ से इंजन और ट्रैक मंगवाया था। सामान जून में पहुंच गया था, लेकिन सेब सीजन के काम में व्यस्त होने के कारण उस समय इसे लगाया नहीं जा सका। बाद में 100 मीटर लंबा ट्रैक तैयार कर इसका परीक्षण किया गया। इस पूरी व्यवस्था पर करीब 4.20 लाख रुपये खर्च हुए हैं। इसमें सरकार की ओर से 50 हजार रुपये की सब्सिडी भी मिली है।

मजदूरों की कमी बनी मोनोरेल लगाने की वजह
सुनील चौहान ने बताया कि उनके बगीचे में दो परिवार लंबे समय से काम कर रहे थे। इनमें से एक परिवार काम छोड़कर जा चुका है, जबकि दूसरा भी जाने की बात कह रहा है। ऐसे में उन्हें चिंता थी कि सेब सीजन में मजदूरों की कमी के कारण फसल की ढुलाई कैसे होगी। इसी परेशानी को देखते हुए उन्होंने मोनोरेल लगाने का फैसला किया। अब उनकी तैयारी अगले सेब सीजन से इसी के जरिये बगीचे से स्टोर तक सेब पहुंचाने की है।

तीन बगीचे, हर साल 4,500 पेटी तक सेब का उत्पादन
सुनील चौहान के पास सेब के तीन बगीचे हैं। फिलहाल उन्होंने एक बगीचे में मोनोरेल लगाई है। परीक्षण सफल होने के बाद अब दूसरे बगीचे में भी इसे लगाने की योजना है। वह हाई डेंसिटी प्लांटेशन यानी सघन बागवानी तकनीक से भी सेब उगा रहे हैं। उन्होंने पुराने बगीचे में टॉप ग्राफ्टिंग के जरिये नई किस्में तैयार की हैं। उनके अनुसार, वह हर साल करीब 4,000 से 4,500 पेटी सेब का उत्पादन करते हैं।
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दूसरे बागवान भी देखने पहुंच रहे
मोनोरेल का परीक्षण सफल होने के बाद आसपास के बागवान भी इसे देखने पहुंच रहे हैं। सुनील चौहान के मुताबिक, कई बागवान इस तकनीक को अपने बगीचों में लगाने की जानकारी ले रहे हैं। उन्होंने जरूरत पड़ने पर दूसरे बागवानों की मदद करने की बात भी कही है। इस तकनीक का इस्तेमाल सेब के अलावा दूसरी फसलों को ढोने में भी किया जा सकता है। पहाड़ी बगीचों में कम जगह में ट्रैक तैयार होने के कारण यह ढुलाई का एक उपयोगी विकल्प बन सकती है।
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