नियुक्ति मामले में सरकार को जवाब दाखिल करने को दिया समय
प्रदेश हाईकोर्ट में राज्य के सीबीएसई से संबद्ध स्कूल ऑफ एक्सीलेंस में शिक्षकों और प्रिंसिपलों की भर्ती और तैनाती की प्रक्रिया को नियमों के अनुसार जल्द से जल्द पूरा करने के मामले में सुनवाई हुई। राज्य सरकार की ओर से इस मामले में जवाब दाखिल नहीं किया गया। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल और न्यायाधीश योगेश जसवाल की खंडपीठ ने पूर्व में दिए गए अंतरिम आदेशों को जारी रखते हुए राज्य सरकार को दो सप्ताह के भीतर अपना विस्तृत जवाब दाखिल करने को कहा है। मामले की अगली सुनवाई दो सप्ताह में होगी। पिछली सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने निर्देश दिया कि जो भी पात्र शिक्षक या प्रिंसिपल चयन प्रक्रिया के तहत आते हैं और जिनकी तैनाती अभी तक नहीं हुई है, उन्हें जल्द से जल्द इन स्कूलों में तैनात किया जाए। अदालत ने राज्य सरकार को आगामी सुनवाई से पहले एक विस्तृत स्टेटस रिपोर्ट प्रस्तुत करने का निर्देश दिया था जिसमें शिक्षकों और प्रिंसिपलों के कुल स्वीकृत पदों की संख्या, वर्तमान में रिक्त पड़े पदों का आंकड़ा और उपलब्ध अभ्यर्थियों और पोस्टिंग के लिए लंबित उम्मीदवारों की कुल संख्या कितनी है।
वसीयत के गवाह का अपरिचित होना कोई संदिग्ध परिस्थिति नहीं
प्रदेश हाईकोर्ट ने संपत्ति विवाद और वसीयत की वैधता को लेकर दायर मामले में स्पष्ट किया है कि कानून में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है जिसके तहत वसीयत का गवाह वसीयतकर्ता का पूर्व परिचित होना आवश्यक हो। कानून की आवश्यकता केवल इतनी है कि दस्तावेज पर कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर हों, जिन्होंने वसीयतकर्ता को हस्ताक्षर करते देखा हो या उससे इसकी पुष्टि प्राप्त की हो। भले ही गवाह पहले से वसीयतकर्ता को न जानता हो, पहचानकर्ता की ओर से पहचान किए जाने के कारण गवाही की वैधता समाप्त नहीं होती है। न्यायाधीश विरेंद्र सिंह की अदालत ने मंडी जिला निवासी गोपी चंद के कानूनी वारिसों की अपील को खारिज करते हुए निचली अदालतों के फैसले को बरकरार रखा। यह विवाद मृतक पुरषोत्तम की संपत्ति को लेकर था।
गोपी चंद (मूल वादी, जिनकी मृत्यु के बाद उनके कानूनी प्रतिनिधियों ने मुकदमा लड़ा) ने अपने दिवंगत और निःसंतान भाई पुरषोत्तम की वसीयत को अदालत में चुनौती दी थी, जिसे पुरुषोत्तम ने वर्ष 2000 में पीतांबर लाल और अन्य (प्रतिवादियों) के नाम कर दिया था। गोपी चंद का दावा था कि उसका सगा भाई मानसिक रूप से बीमार था और प्रतिवादियों ने धोखाधड़ी से जमीन अपने नाम करवा ली। प्रतिवादियों ने तर्क दिया कि पुरषोत्तम ने अपनी स्वेच्छा और सही मानसिक स्थिति में वसीयत निष्पादित की थी। उन्होंने यह भी उजागर किया कि गोपी चंद और उनके बेटों ने पुरषोत्तम पर हमला किया था, जिसके बाद एक आपराधिक मामला भी दर्ज हुआ था। इसी वजह से पुरषोत्तम ने अपनी संपत्ति अपने भाई को न देकर देखभाल करने वाले प्रतिवादियों को दी।मामले की गहराई से जांच करने पर सामने आया कि साल 2000 में जमीन के विवाद को लेकर खुद गोपी चंद और उसके बेटे ने अपने सगे भाई पुरषोत्तम पर दराटी और लाठियों से जानलेवा हमले का आरोप लगाया था, जिसके बाद पुरषोत्तम ने उनके खिलाफ आपराधिक मामला दर्ज कराया था।
अनुकंपा के आधार पर नियुक्ति का दावा खारिज करने का आदेश रद्द
हाईकोर्ट ने अनुकंपा के आधार पर नौकरी से जुड़ी याचिका का निपटारा करते याचिकाकर्ता को बिजली बोर्ड में जेओए आईटी के पद पर नियुक्ति पत्र जारी करने के निर्देश दिए हैं। अदालत के आदेशों के बाद बिजली बोर्ड लिमिटेड की ओर से अनुकंपा नियुक्ति के दावे को खारिज करने वाले पुराने आदेश को निरस्त करते हुए याचिकाकर्ता को जूनियर ऑफिस असिस्टेंट -जेओए (आईटी) का पद ऑफर किया गया है। न्यायाधीश ज्योत्स्ना रिवाल दुआ की अदालत ने यह फैसला शुभम की ओर से दायर याचिका पर दिया है। अनुकंपा नीति के क्लॉज 5(सी) के तहत उम्मीदवार को टाइपिंग टेस्ट पास करना अनिवार्य है। इसके लिए 12 महीने के भीतर अधिकतम तीन अवसर दिए जाते हैं। याचिकाकर्ता ने 23 अगस्त 2026 को अपना पहला अवसर दिया है, जिसके परिणाम का इंतजार है। याचिकाकर्ता ने बिजली बोर्ड के 19 फरवरी 2020 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसके तहत अनुकंपा के आधार पर नौकरी पाने के उनके दावे को खारिज कर दिया गया था।याचिका में बोर्ड के 2020 के निरस्तीकरण आदेश को रद्द करने तथा हेल्पर, क्लर्क के पद पर अनुकंपा नियुक्ति प्रदान करने की मांग की गई थी।
प्रोबेशन में एफआईआर दर्ज होने पर बिना जांच बर्खास्त करना गैरकानूनी
प्रदेश हाईकोर्ट ने प्रोबेशन अवधि पर चल रहे कर्मचारियों को लेकर एक बड़ा फैसला दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि सेवा के दौरान दर्ज हुई किसी एफआईआर को आधार बनाकर किसी प्रोबेशनर कर्मचारी को बिना विभागीय जांच के सीधे नौकरी से बर्खास्त करना गैरकानूनी है। न्यायाधीश अजय मोहन गोयल की अदालत ने स्टेट बैंक ऑफ इंडिया में प्रोबेशन पर तैनात जूनियर एसोसिएट की सेवा समाप्ति के आदेश को रद्द कर दिया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि यदि सेवा में आने के बाद कर्मचारी के खिलाफ कोई आपराधिक मामला दर्ज होता है, तो बिना औपचारिक जांच और सुनवाई का मौका दिए उसे नौकरी से निकालना कानूनन एक कलंकित करने वाला आदेश माना जाएगा। अदालत ने कहा कि यदि कर्मचारी ने नौकरी पाने के लिए पुराने आपराधिक मामलों को छिपाया होता, तो उसे बिना जांच हटाया जा सकता था। इस मामले में एफआईआर नौकरी ज्वाइन करने के बाद की घटना है। बैंक ने याचिकाकर्ता को काम असंतोषजनक होने के कारण नहीं, बल्कि एफआईआर दर्ज होने और गरिमा खोने के आधार पर निकाला। यह आदेश कर्मचारी के करियर पर कलंक लगाता है, जो उसके भविष्य को प्रभावित करेगा। जब भी किसी प्रोबेशनर को किसी कदाचार या आपराधिक मामले के कारण हटाया जाता है, तो उसे अपनी बात रखने का मौका और नियमित विभागीय जांच का अधिकार मिलना अनिवार्य है। याचिकाकर्ता के वरिष्ठ अधिवक्ता ने तर्क दिया कि यह मामला पूर्वाग्रह और छिपाने का नहीं है।