सूत्रों के अनुसार क्राइम ब्रांच यह पता लगाने में जुटी है कि ये ब्लैक लिस्ट वाहन किन-किन माध्यमों से बाजार तक पहुंचे और किनकी भूमिका इनके सौदों में रही। टीम उन कार डीलरों, बिचौलियों और वाहन खरीदने वाले लोगों से भी पूछताछ कर रही है जिनके जरिये ये गाड़ियां ग्राहकों तक पहुंचीं। टीम का फोकस साक्ष्य जुटाने और नेटवर्क के हर लिंक को जोड़ने पर है। कई ऐसे नाम भी जांच एजेंसियों के रडार पर हैं जो सीधे तौर पर विभाग से जुड़े नहीं थे, लेकिन वाहन खरीद-फरोख्त-दस्तावेजी प्रक्रिया में सक्रिय भूमिका निभा रहे थे। क्राइम ब्रांच के एक अधिकारी ने स्पष्ट किया है कि फिलहाल उनकी प्राथमिकता उन गाड़ियों को इकट्ठा करना है जिन्हें ब्लैकलिस्ट किया गया है या जिनका पंजीकरण धोखाधड़ी से कराया गया था।
क्राइम ब्रांच की टीम आरएलए कार्यालय के कंप्यूटर सिस्टम, एक्सेस लॉग, डिजिटल रिकॉर्ड और विभागीय लॉगिन गतिविधियों की बारीकी से जांच कर रही है। मामले में बिलासपुर आरएलए से पंजीकृत दो फॉर्च्यूनर और एसयूवी गाड़ियां पूरे नेटवर्क के खिलाफ सबसे अहम सुराग बनकर सामने आई थीं। गिरोह ने इन गाड़ियों को पूरी तरह वैध बताकर दिल्ली के ग्राहकों को बेचा था। बाद में जांच में सामने आया कि इनका पंजीकरण जाली दस्तावेजों और फर्जी डिजिटल एंट्री आधार पर किया था।
बड़ा सवाल यह है कि इतने बड़े फर्जीवाड़े के बावजूद अब तक किसी बड़े अधिकारी या प्रभावशाली तक जांच की आंच नहीं पहुंच पाई है। प्रदेश स्तर पर गठित जांच कमेटियां भी साढ़े चार माह बाद अपनी अंतिम रिपोर्ट पेश नहीं कर सकी हैं। इससे जांच प्रक्रिया और उसकी गंभीरता पर सवाल उठने लगे हैं। अब तक केवल निचले स्तर के कर्मचारियों पर कार्रवाई होती दिख रही है, जबकि पूरे नेटवर्क को संचालित करने वाली बड़ी कड़ियां अभी भी जांच से दूर हैं।