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Shimla News: जाठिया देवी माउंटेन टाउनशिप पर संघर्ष समिति ने लगाया गुमराह करने का आरोप

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सरकार से पूछा, 244 बीघा जमीन की अधिग्रहित, फिर 600 बीघा का दावा क्यों
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आठ गांवों के विस्थापन की जताई आशंका : देशराज
सरकार ने जबरन जमीन न लेने का दिया था आश्वासन
अमर उजाला ब्यूरो
शिमला। जाठिया देवी माउंटेन टाउनशिप के लिए 600 बीघा भूमि अधिग्रहण किए जाने की बात कहकर लोगों को गुमराह किया जा रहा है। मंत्रिमंडल ने हाल ही में 600 बीघा भूमि पर टाउनशिप विकसित करने की बात कही है, जबकि हकीकत यह है कि हिमुडा ने अब तक करीब 244 बीघा भूमि का ही अधिग्रहण किया है।
यह दावा भूमि अधिग्रहण संघर्ष समिति के अध्यक्ष एवं बागी पंचायत के उपप्रधान देसराज ने किया है। उन्होंने कहा कि हिमुडा की ओर से भूमि अधिग्रहण को लेकर किए जा रहे दावे तथ्यों से परे हैं। उन्होंने कहा कि मंत्रिमंडल की बैठक में निर्णय लिया है कि 600 बीघा भूमि पर प्रस्तावित परियोजना की भू-तकनीकी जांच और स्ट्रक्चरल डिजाइन का सत्यापन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान (आईआईटी) या राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (एनआईटी) जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से करवाया जाएगा। उन्होंने कहा कि वास्तविकता यह है कि हिमुडा के पास अभी 244 बीघा भूमि ही है। देसराज ने कहा कि जाठिया देवी माउंटेन टाउनशिप के नाम पर जिस तरह से भूमि अधिग्रहण की प्रक्रिया गुपचुप तरीके से आगे बढ़ाई जा रही है, उससे क्षेत्र के लोगों में चिंता बढ़ रही है। समिति को आशंका है कि कहीं हिमुडा चोरी-छिपे आठ गांवों को विस्थापित कर उनकी जमीन अधिग्रहित करने की तैयारी तो नहीं कर रहा है। उन्होंने कहा कि परियोजना के लिए प्रस्तावित जमीन में लोगों की कृषि भूमि, घासनियां, रिहायशी मकान, शामलात भूमि, चारागाह और अन्य उपयोग की जमीन शामिल है। ऐसे में बड़े स्तर पर भूमि अधिग्रहण होने से ग्रामीणों की आजीविका और सामाजिक ढांचे पर असर पड़ने की आशंका है।
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संघर्ष समिति के अनुसार, भूमि अधिग्रहण के विरोध में संबंधित पंचायतों में ग्रामसभाएं आयोजित की गईं। समिति का दावा है कि इन बैठकों में ग्रामीणों ने प्रस्तावित अधिग्रहण का विरोध करते हुए प्रक्रिया को निरस्त करने की मांग उठाई। समिति ने प्रशासन के समक्ष लिखित आपत्तियां भी दर्ज करवाई हैं। समिति के मुताबिक, सामाजिक प्रभाव आकलन रिपोर्ट में भी प्रभावित क्षेत्रों से जुड़े कई महत्वपूर्ण पहलुओं को पर्याप्त रूप से शामिल नहीं किया गया है। समिति के सचिव मदन लाल शास्त्री और बागी पंचायत की प्रधान उमा शांडिल ने कहा कि पहले भी समिति की ओर से प्रशासन और सरकार के समक्ष अपनी आपत्तियां रखी गई थीं। समिति का कहना है कि मुख्यमंत्री सुखविंद्र सिंह सुक्खू, नगर नियोजन मंत्री राजेश धर्माणी और स्वास्थ्य मंत्री धनीराम शांडिल को भी मामले से अवगत करवाया था। सभी ने आश्वासन दिया था कि किसी भी ग्रामीण से जबरन जमीन नहीं ली जाएगी। अब 600 बीघा जमीन की बात कहकर ग्रामीणों को सकते में डाला जा रहा है।
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विस्थापन हुआ तो आजीविका पर पड़ेगा असर
समिति अध्यक्ष ने कहा कि आठ गांवों की जमीन अधिग्रहित होने की स्थिति में केवल जमीन मालिक ही प्रभावित नहीं होंगे, बल्कि खेती, पशुपालन, बागवानी और छोटे कारोबार से जुड़े परिवारों की आजीविका पर भी असर पड़ेगा। ग्रामीणों का कहना है कि जमीन उनके लिए केवल संपत्ति नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही आजीविका और सामाजिक व्यवस्था का आधार है। समिति ने सरकार से पूरे मामले में स्थिति स्पष्ट करने और ग्रामीणों की सहमति और आपत्तियों को ध्यान में रखते हुए भूमि अधिग्रहण की आगामी प्रक्रिया रोकने की मांग की है। भूमि अधिग्रहण संघर्ष समिति भूमि अधिग्रहण को लेकर मंगलवार को बैठक करेगी। देसराज ने कहा कि बैठक में 150 भूमि मालिक शामिल होंगे। इसमें भूमि अधिग्रहण के विरोध को लेकर रणनीति तैयार की जाएगी।
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