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Rajasthan:तीसरे बच्चे के नाम पर मैटरनिटी लीव रोकी, हाईकोर्ट ने शिक्षा विभाग को एक सप्ताह में फैसला लेने को कहा

Thu, 20 Aug 2026 05:07 PM IST
Sourabh Bhatt न्यूज डेस्क, अमर उजाला, जयपुर

सार

राजस्थान हाईकोर्ट ने तीसरे बच्चे के जन्म पर मैटरनिटी लीव से इनकार को अनुचित माना। कोर्ट ने शिक्षा विभाग को महिला कर्मचारी के आवेदन पर एक सप्ताह में उचित निर्णय लेने के निर्देश दिए।
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राजस्थान हाईकोर्ट - फोटो : सोशल मीडिया
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तीसरे बच्चे पर भी मैटरनिटी लीव से इनकार नहीं कर सकते: राजस्थान हाईकोर्ट का अहम फैसला, शिक्षा विभाग को एक सप्ताह में निर्णय के निर्देश

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जयपुर। राजस्थान हाईकोर्ट ने मैटरनिटी लीव को लेकर अहम फैसला सुनाते हुए स्पष्ट किया है कि किसी महिला सरकारी कर्मचारी को सिर्फ इस आधार पर मातृत्व अवकाश से वंचित नहीं किया जा सकता कि वह तीसरे बच्चे को जन्म दे रही है। कोर्ट ने कहा कि यह भी देखा जाना जरूरी है कि महिला ने अपनी सरकारी सेवा के दौरान पहले कितनी बार मैटरनिटी लीव ली है।
जस्टिस रेखा बोराणा ने सरकारी स्कूल शिक्षिका चंद्रकांता पाहाड़िया की याचिका स्वीकार करते हुए शिक्षा विभाग को उनके मैटरनिटी लीव के आवेदन पर दोबारा उचित निर्णय लेने के निर्देश दिए। कोर्ट ने कहा कि आदेश की प्रति मिलने के एक सप्ताह के भीतर विभाग को इस संबंध में आदेश जारी करना होगा।

तीसरा बच्चा होने के आधार पर विभाग ने रोकी छुट्टी

चंद्रकांता पाहाड़िया की पहली शादी 25 मार्च 1999 को हुई थी और 7 सितंबर 2000 को उनकी पहली संतान का जन्म हुआ। उस समय वह सरकारी सेवा में नहीं थीं। वर्ष 2005 में उनकी सरकारी शिक्षक के रूप में नियुक्ति हुई।

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सरकारी नौकरी में आने के बाद 8 अक्टूबर 2005 को उन्होंने दूसरी संतान को जन्म दिया और उस दौरान पहली बार मैटरनिटी लीव ली। बाद में वर्ष 2015 में उनका पहली शादी से तलाक हो गया।
दिसंबर 2023 में उन्होंने दूसरी शादी की। इस विवाह से 20 जून 2026 को उनकी तीसरी संतान का जन्म हुआ। इसके बाद उन्होंने शिक्षा विभाग में मैटरनिटी लीव के लिए आवेदन किया, लेकिन विभाग ने यह कहते हुए आवेदन खारिज कर दिया कि उनके सर्विस रिकॉर्ड में पहले से दो बच्चों का उल्लेख है और अब जन्म लेने वाला बच्चा तीसरा है।

हाईकोर्ट में दी चुनौती

विभाग के फैसले के खिलाफ शिक्षिका ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उनकी ओर से दलील दी गई कि सरकारी सेवा में आने के बाद उन्होंने अब तक सिर्फ एक बार मैटरनिटी लीव ली है। ऐसे में केवल तीसरा बच्चा होने के आधार पर उन्हें सेवा अवधि में दूसरी बार मिलने वाले मातृत्व अवकाश से वंचित नहीं किया जा सकता।
हाईकोर्ट ने भी इसी तथ्य को महत्वपूर्ण माना। कोर्ट ने कहा कि महिला की स्थिति को केवल उसकी कुल संतानों की संख्या के आधार पर नहीं देखा जा सकता। यह भी देखना होगा कि उसने सरकारी सेवा के दौरान कितनी बार मैटरनिटी लीव का लाभ लिया है।

मैटरनिटी लीव का उद्देश्य भी देखना जरूरी

हाईकोर्ट ने राजस्थान सर्विस रूल्स, 1951 के नियम 103 और 103-सी का उल्लेख करते हुए कहा कि मैटरनिटी लीव के प्रावधान को केवल बच्चों की संख्या तक सीमित करके नहीं पढ़ा जा सकता। कोर्ट के अनुसार मातृत्व अवकाश का उद्देश्य महिला कर्मचारी और बच्चे की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए जरूरी छुट्टी और सुरक्षा उपलब्ध कराना है। ऐसे में नियमों की ऐसी व्याख्या नहीं की जा सकती, जिससे मैटरनिटी लीव के मूल उद्देश्य को ही खत्म कर दिया जाए।

सुप्रीम कोर्ट के 2025 के फैसले का भी हवाला

राजस्थान हाईकोर्ट ने अपने फैसले में सुप्रीम कोर्ट के 2025 के के. उमादेवी बनाम तमिलनाडु सरकार मामले में दिए गए फैसले का भी सहारा लिया। सुप्रीम कोर्ट ने मैटरनिटी लीव से जुड़े प्रावधानों की व्याख्या उनके सामाजिक उद्देश्य को ध्यान में रखकर करने पर जोर दिया था।
हाईकोर्ट ने इसी सिद्धांत को लागू करते हुए कहा कि महिला कर्मचारी के मातृत्व अवकाश के अधिकार को केवल बच्चों की संख्या के आधार पर सीमित नहीं किया जा सकता।

एक सप्ताह में निर्णय लेना होगा

हाईकोर्ट ने चंद्रकांता पाहाड़िया की याचिका मंजूर करते हुए शिक्षा विभाग को उनके मैटरनिटी लीव आवेदन पर पुनर्विचार कर उचित आदेश जारी करने का निर्देश दिया है। विभाग को आदेश की प्रति प्राप्त होने के एक सप्ताह के भीतर निर्णय लेना होगा।

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हालांकि, फैसले का अर्थ यह नहीं है कि हर महिला सरकारी कर्मचारी को तीसरी संतान होने पर हर परिस्थिति में मैटरनिटी लीव का अधिकार स्वतः मिल जाएगा। हाईकोर्ट ने इस मामले में महिला की सरकारी सेवा के दौरान ली गई मैटरनिटी लीव, पारिवारिक परिस्थितियों और मामले के विशिष्ट तथ्यों को ध्यान में रखकर राहत दी है।

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