दतिया विधानसभा उपचुनाव का परिणाम सबके सामने है। कांग्रेस ने अपनी सीट बरकरार रखी है। सुबह 8 बजे से मतगणना शुरू हुई। दोपहर बाद कांग्रेस प्रत्याशी ने बढ़त बनाई और इसे जीत तक जारी रखा। हालांकि इस उपचुनाव के नतीजे से प्रदेश सरकार की स्थिरता पर कोई असर नहीं पड़ेगा, लेकिन इसके राजनीतिक मायने काफी अहम माने जा रहे हैं। राजनीतिक दल इसे 2028 के विधानसभा चुनाव से पहले जनता के मूड की पहली बड़ी परीक्षा के रूप में देख रहे थे।
बता दें कि 30 जुलाई को हुए मतदान में 1 लाख 57 हजार 407 मतदाताओं ने अपने मताधिकार का प्रयोग किया। इनमें 85,989 पुरुष, 71,414 महिलाएं और चार अन्य मतदाता शामिल रहे। कुल मतदान 71.42 प्रतिशत दर्ज हुआ। पुरुषों का मतदान 74.05 प्रतिशत और महिलाओं का मतदान 68.48 प्रतिशत रहा।
कांग्रेस ने इस सीट पर अपना कब्जा बरकरार रखकर ग्वालियर-चंबल क्षेत्र में अपनी राजनीतिक मजबूती का संदेश दिया है। इस जीत के साथ जीतू पटवारी के नेतृत्व पर उठ रहे सवालों को भी विराम मिल गया है। इस जीत ने कांग्रेस कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाया है, कहा जा रहा है कि 2028 के विधानसभा चुनाव की तैयारियों को नई गति मिलेगी।
भाजपा का दांव पड़ा फेल
दतिया को पूर्व गृहमंत्री डॉ. नरोत्तम मिश्रा का राजनीतिक गढ़ माना जाता है। उपचुनाव में उन्हें टिकट का प्रबल दावेदार माना जा रहा था, लेकिन भाजपा ने उनकी जगह आशुतोष तिवारी को उम्मीदवार बनाया। इसके बाद हुए विवाद के बावजूद मिश्रा ने सार्वजनिक रूप से आशुतोष तिवारी को जिताने की अपील की। लेकिन दतिया की जनता ने आशुतोष को स्वीकार नहीं किया। दबे जुबान से ये भी चर्चा है कि भाजपा का टिकट बदलने का दांव ही भाजपा की हार की वजह बन गया है। कहा तो ये भी जा रहा है कि भले नरोत्तम मिश्रा आशुतोष के साथ रहे, पर उनके समर्थकों की नाराजगी चुनावी परिणाम में नजर आई है।
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कांग्रेस की रणनीति काम कर गई
दूसरी ओर कांग्रेस ने पूर्व विधायक घनश्याम सिंह पर दांव लगाया। उनकी पहचान सरल और साफ-सुथरी छवि वाले नेता के रूप में रही है। राजपरिवार से जुड़े होने के कारण क्षेत्र में उनकी अच्छी पकड़ मानी जाती है। ग्रामीण इलाकों में भी उनका प्रभाव नजर आया। कांग्रेस की ये रणनीति काम कर गई। जनता का आशीर्वाद कांग्रेस के पाले में गया। वहीं कांग्रेस की जीत का एक कारण अन्य प्रत्याशी भी माने जा रहे हैं। दामोदर यादव ने जीत के अंतर से ज्यादा वोट हासिल किए, कहीं न कहीं इन्हीं वोटों ने जीत का समीकरण लिखा।
राजनीतिक विश्लेषकों का क्या कहना है?
राजनीतिक विश्लेषकों का शुरू से मानना रहा है कि अपेक्षाकृत कम मतदान, महिलाओं की घटती भागीदारी और भाजपा में भितरघात की चर्चाओं ने परिणाम का आधार रख दिया था। विश्लेषकों का मानना है कि कांग्रेस ये प्रदर्शन 2028 की तैयारी के रूप में देख रही है। पटवारी कार्यकर्ताओं का ये जोश 2028 तक कायम रख सके तो कांग्रेस मुकाबले में अलग स्तर पर पहुंच सकती है।
2028 की रणनीति के लिए अहम संकेत
राजनीतिक जानकारों का मानना है कि दतिया उपचुनाव का परिणाम केवल एक विधायक चुनने तक सीमित नहीं था। इससे यह संकेत भी मिला है कि प्रदेश में भाजपा और कांग्रेस की संगठनात्मक तैयारी, चुनावी रणनीति और जनसमर्थन किस दिशा में बढ़ रहा है।