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MP: ‘हर घर जल’ के दावों पर सवाल? 25 फीट गहरे कुएं में उतरकर पानी भर रहे मासूम; गंदे पानी पर निर्भर 45 परिवार

Tue, 26 May 2026 10:35 AM IST
बुरहानपुर ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला, बुरहानपुर

सार

बुरहानपुर के धूलकोट क्षेत्र में जल जीवन मिशन के दावों की हकीकत सामने आई है। यहां रेखालिया झिरा फालिया के 45 आदिवासी परिवार गंदे कुएं के पानी पर निर्भर हैं, जबकि बच्चे जान जोखिम में डालकर 25 फीट गहरे कुएं में उतरकर पानी भरने को मजबूर हैं। आखिर इस मुद्दे पर किसने क्या कहा? जानने के लिए पढ़िए ये खबर।
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यहां बच्चे जान जोखिम में डालकर 25 फीट गहरे कुएं में उतरकर पानी भरने को मजबूर हैं। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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मध्य प्रदेश में एक तरफ सरकार जल जीवन-मिशन के तहत हर घर तक नल से पानी पहुंचाने के दावे कर रही हैं। वहीं, दूसरी और जमीनी हकीकत कुछ और ही है।
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वैसे तो बुरहानपुर जिले को पूरे देश में सबसे पहले हर घर नल से जल पहुंचाने वाले जिले का तमगा भी मिल चुका है। लेकिन दूसरी तरफ आदिवासी बाहुल्य धूलकोट क्षेत्र से जो तस्वीर सामने आई है, वो सरकारी दावों की पोल खोल रही है। 
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हालांकि, प्यास के लिए कैसे बच्चे और बुजुर्ग यहां अपनी जान को खतरे में डालकर पानी गंदे कुएं से पानी निकालते हैं, इसका वीडियो सोशल मीडिया पर कई दिनों से वायरल हो रहा है। वीडियो सामने आने के बाद जिला प्रशासन की नींद खुली। जल संकट को लेकर सामने आई तस्वीरें और वीडियो को देखकर आप अनुमान लगा सकते हैं कि हालात कितने चुनौती पूर्ण हैं। 

 

फालिया में 45 आदिवासी परिवार एक ही गंदे कुएं के पानी पर निर्भर हैं। - फोटो : अमर उजाला
45 आदिवासी परिवार एक ही गंदे कुएं के पानी पर निर्भर
बता दें, ग्राम पंचायत भगवानिया के रेखालिया झिरा फालिया में 45 आदिवासी परिवार एक ही गंदे कुएं के पानी पर निर्भर हैं। हालात इतने खराब हैं कि मासूम बच्चे अपनी जान जोखिम में डालकर करीब 25 फीट गहरे कुएं में उतरकर पानी निकालने को मजबूर हैं।

ये तस्वीरें किसी पुराने दौर की नहीं बल्कि बुरहानपुर जिले के धूलकोट क्षेत्र की हैं। जहां भीषण गर्मी के बीच पानी के लिए आदिवासी परिवार रोज संघर्ष कर रहे हैं। रेखालिया झिरा फालिया में रहने वाले करीब 45 परिवारों के लिए न नल है। न टंकी न साफ पानी की व्यवस्था। पूरे फालिया के लोग इसी कुएं के गंदे पानी पर निर्भर हैं।

जान जोखिम में डालकर गंदे कुएं से पानी भरता हुआ किशोर। - फोटो : अमर उजाला
'बच्चे रस्सियों के सहारे अंदर उतरकर पानी भरते हैं'
स्थानीय ग्रामीण ज्ञान सिंह कहते हैं कि कुएं में पानी इतना नीचे चला गया है कि बच्चे रस्सियों के सहारे अंदर उतरकर पानी भरते हैं। जरा सी चूक और बड़ा हादसा हो सकता है,सरकार कहती है हर घर पानी पहुंचा। लेकिन यहां लोग कुएं में उतरकर पानी भर रहे हैं।
 

अलग-अलग तस्वीरों कुछ इस तरह मौत के मुंह में जाकर पानी निकालते ये मासूम व किशोर बच्चे- बच्चियां। - फोटो : अमर उजाला
'हर बार सिर्फ आश्वासन मिला'
ग्रामीणों का आरोप है कि पंचायत को कई बार कुएं के गहरीकरण और पेयजल व्यवस्था की मांग की गई। लेकिन हर बार सिर्फ आश्वासन मिला। अगर समय रहते कुएं का गहरीकरण हो जाता तो आज मासूम बच्चों को अपनी जान जोखिम में डालकर पानी नहीं भरना पड़ता। गांव में बिजली की भी पर्याप्त व्यवस्था नहीं है।
टैंकर भी नियमित रूप से नहीं पहुंच रहे।

'हम लोग कई साल से परेशान हैं'
आदिवासी परिवारों का कहना है कि जल जीवन मिशन के बड़े-बड़े दावों के बावजूद उनके हिस्से में सिर्फ गंदा पानी और प्रशासनिक लापरवाही आई है। कोनू बाई ने बताया कि हम लोग कई साल से परेशान हैं। पीने के लिए साफ पानी नहीं मिलता। गंदा पानी पीने से बच्चे बीमार पड़ते हैं। लेकिन दूसरा कोई सहारा नहीं। वहीं, किशोर राजेश एवं गनसिंह ने अपनी व्यथा सुनाई बोले कि हम लोग नीचे उतरकर पानी भरते हैं। डर लगता है लेकिन पानी तो लाना पड़ता है। कुएं का गहरीकरण और टैंकर की व्यवस्था होनी चाहिए।

कांग्रेस नेता अजय रघुवंशी। - फोटो : अमर उजाला
आदिवासी क्षेत्रों की लगातार अनदेखी की जा रही-कांग्रेस नेता
मामले को लेकर कांग्रेस नेता अजय रघुवंशी ने जिला प्रशासन और पंचायत पर निशाना साधते हुए कहा कि आदिवासी क्षेत्रों की लगातार अनदेखी की जा रही है। उन्होंने कहा कि सरकार सिर्फ कागजों में योजनाएं चला रही है, जबकि जमीनी हालात बेहद खराब हैं।
 
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जिले में व्याप्त जल संकट को लेकर आधिकारिक बयान। - फोटो : अमर उजाला
प्रशासन ने जानें क्या कहा?
वहीं, प्रशासन की ओर से सृजन श्रीवास्तव ने कहा कि मामले की जानकारी ली जा रही है और जल्द वैकल्पिक पेयजल व्यवस्था कराई जाएगी। एसडीएम भागीरथ वाखला ने भी ग्रामीणों को राहत देने और आवश्यक कार्रवाई का आश्वासन दिया है।

फिलहाल सवाल यही है कि जब 'हर घर नल से जल' का दावा किया जा चुका है तो फिर आखिर आदिवासी बच्चे आज भी अपनी जान जोखिम में डालकर गंदा पानी भरने को क्यों मजबूर हैं? क्या जिम्मेदारों की नींद किसी बड़े हादसे के बाद खुलेगी या फिर इन आदिवासी परिवारों को यूं ही प्यास और परेशानी के बीच जीना पड़ेगा।
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