पीड़ित लालता सिंह व उनके अन्य साथी चोरी के झूठे मामले में 20 दिन तक जेल में रहे। जमानत कराकर जेल से बाहर आए। इसके बाद उन्होंने और उनकी पत्नी ने झूठे केस के खिलाफ शिकायत की और पैरवी शुरू की। पांच वर्ष तक लंबी लड़ाई लड़ी। तब जाकर उनको न्याय मिला है। उनका कहना है कि जब तक आरोपी पुलिस वालों को सजा नहीं मिल जाती, पूरा न्याय नहीं होगा।
लालता सिंह बताते हैं कि 20 दिन उन्होंने रो-रोकर जेल में समय गुजारा। जमानत पर बाहर आने के बाद आरोपी उनके बेटों की गिरफ्तारी का दबाव बनाने लगे। जांच शुरू हुई तो झूठ सामने आने लगा। उन्होंने बताया कि उनके खिलाफ गांव में लड़ाई-झगड़े के पहले से कुछ छोटे केस दर्ज थे। पुराने मामलों को आधार बनाते हुए बंथरा पुलिस ने उनकी हिस्ट्रीशीट भी खोल दी थी। अब वह हिस्ट्रीशीट को निरस्त करने के प्रयास में लगे हैं।
आरोपी पुलिसकर्मियों पर आईपीसी की धारा 193 (झूठे साक्ष्य गढ़ना, सजा-सात वर्ष) और 201 (साक्ष्य से छेड़छाड़, सजा-सात वर्ष), 120बी (साजिश रचना, सजा-अपराध के आधार पर), 211 (झूठा आरोप लगाकर नुकसान पहुंचाना, सजा-सात वर्ष) 166 (लोक सेवक द्वारा जानबूझकर कानून का उल्लंघन करना, सजा-एक वर्ष) और 167 (लोक सेवक द्वारा फर्जी साध्य बनाना, सजा-तीन वर्ष) के तहत में केस दर्ज किया गया है। चूंकि मामला बोएनएस लागू होने के पहले का है इसलिए आईपीसी में केस दर्ज किया गया है।