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UP: नकली दवा कारोबार में मोटा मुनाफा, लखनऊ सहित कई जिलों में 20 करोड़ की फर्जी दवाएं जब्त

Wed, 22 Jul 2026 10:21 AM IST
Ishwar Ashish Bhartiya चंद्रभान यादव, अमर उजाला, लखनऊ

सार

यूपी में नकली दवाओं का कारोबार सिर्फ मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ नहीं कर रहा, बल्कि मेडिकल स्टोर संचालकों के लिए मोटी कमाई का जरिया भी बन गया है। 
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नकली दवा का कारोबार - फोटो : amar ujala
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विस्तार
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केस - 1: एफएसडीए की जांच में ब्लड प्रेशर नियंत्रित करने की दवा टेल्मा एच भी पकड़ी गई। पता चला कि यह नकली दवा खुदरा कारोबारियों को 25 से 30 रुपये प्रति पत्ता दी गई है जबकि इसका प्रिंट मूल्य 380 रुपये प्रति पत्ता है। यह पक्के बिल पर दुकानदारों को 300 से 310 रुपये में मिलती है।

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केस - 2: बवासीर के मरीजों को दी जाने वाली सिटकॉम का प्रति पत्ता प्रिंट मूल्य 980 रुपये है। नकली दवा मेडिकल स्टोर पर 100 रुपये प्रति पत्ता पहुंचाई गई। इसी तरह कफ सिरप व अन्य दवाएं भी प्रिंट मूल्य से 10 गुना कम कीमत पर स्टोर पर पहुंचाई जा रही हैं।

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प्रदेश में नकली दवाओं का कारोबार सिर्फ मरीजों की जिंदगी से खिलवाड़ नहीं कर रहा, बल्कि मेडिकल स्टोर संचालकों के लिए मोटी कमाई का जरिया भी बन गया है। फुटकर दवा विक्रेताओं को नामचीन कंपनियां प्रति पत्ता अधिकतम 20 फीसदी तक लाभ देती हैं जबकि नकली दवाओं पर उन्हें 10 गुना लाभ मिल रहा है। इतना ही नहीं, नकली दवाएं बेचने के बाद उनकी कीमत लौटानी नहीं पड़ती है। इसी आकर्षण में खुदरा दवा कारोबारी नकली दवाओं को स्टोर पर बेच रहे हैं। यह खुलासा खाद्य सुरक्षा एवं औषधि विभाग (एफएसडीए) की जांच में हुआ है।

एफएसडीए की टीम ने आगरा, लखनऊ, गोंडा, लखीमपुर खीरी, महराजगंज, गोरखपुर सहित विभिन्न स्थानों से करीब 20 करोड़ की नकली दवाएं जब्त की हैं। विभिन्न स्थानों पर पकड़े गए लोगों से पूछताछ में न सिर्फ पूरे नेटवर्क का खुलासा हुआ है, बल्कि इस कारोबार में मुनाफाखोरी की रणनीति भी पता चली है। सूत्रों का कहना है कि नकली दवाओं के सैंपल में न के बराबर केमिकल मिला है। सिर्फ खड़िया मिट्टी को चूने में मिलाकर टैबलेट का स्वरूप दे दिया गया है। यही वजह है कि ये दवाएं मर्ज पर बेअसर हैं।

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एफएसडीए आयुक्त बोलीं- नकली दवाओं का नेटवर्क खत्म करने के लिए हर जिले में जांच चल रही

पूछताछ में यह भी पता चला कि नामचीन कंपनियां दवा डिपो और थोक कारोबारियों को निर्धारित मूल्य पर करीब 10 फीसदी लाभ देती हैं जबकि खुदरा विक्रेता को 15 से 20 फीसदी तक लाभ मिलता है। यदि खुदरा विक्रेता 10 फीसदी की छूट दे दे तो भी उसे ज्यादातर दवाओं में प्रति पत्ता (10 से 15 टैबलेट) करीब 10 फीसदी तक लाभ मिल जाता है।

वहीं, हरियाणा, राजस्थान और उत्तराखंड से आ रही नकली दवाओं में डिपो का कोई खेल ही नहीं है। ये दवाएं सीधे निर्माण स्थल से नामचीन कंपनी के रैपर में विभिन्न शहरों के गोपनीय गोदामों तक पहुंचती हैं। वहां से छोटी-छोटी बाजारों के मेडिकल स्टोरों पर पहुंचाई जाती हैं। मेडिकल स्टोर संचालक को असली दवा खरीदने पर पक्का बिल मिलता है और उसे तत्काल उसकी कीमत चुकानी पड़ती है। इसके विपरीत नकली दवाएं बिना कीमत चुकाए ही मिलती हैं। मेडिकल स्टोर संचालक दवाओं को बेचने के बाद अगले माह खेप लेकर आने वाले कर्मचारी को भुगतान करता है। दवा के रैपर पर प्रिंट मूल्य 100 रुपये है तो मेडिकल स्टोर संचालक को 10 रुपये में ही उपलब्ध कराया जाता है।

एफएसडीए आयुक्त डॉ. रोशन जैकब का कहना है कि नकली दवाओं का नेटवर्क खत्म करने के लिए हर जिले में जांच चल रही है। दुकानदारों से अपील है कि बिना पक्के बिल के न दवा बेचें और न ही खरीदें। जांच में मेडिकल स्टोर पर बिना बिल की दवा मिली तो सख्त कार्रवाई की जाएगी।
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