विनीत चतुर्वेदी
लखनऊ। बढ़ती महंगाई के बीच जब पाठ्यपुस्तकों की कीमतें छात्रों की जेब पर भारी पड़ रही हैं, ऐसे में लखनऊ विश्वविद्यालय की एक अनोखी को-ऑपरेटिव लाइब्रेरी आर्थिक रूप से कमजोर छात्रों के लिए सहारा बनी हुई है। यहां महज ढाई सौ रुपये जमा कर कोई भी छात्र दो सेमेस्टर की सभी जरूरी पाठ्यपुस्तकें जारी करा सकता है और अपनी पढ़ाई आगे बढ़ा सकता है। यह व्यवस्था उन विद्यार्थियों के लिए बड़ी राहत साबित होती है, जिनके लिए हर सेमेस्टर में हजारों रुपये की किताबें खरीद पाना आसान नहीं होता।
लखनऊ विश्वविद्यालय में साल 1966 में स्थापित यह देश की पहली विश्वविद्यालय को-ऑपरेटिव लाइब्रेरी मानी जाती है। करीब 80 हजार से अधिक पुस्तकों का समृद्ध भंडार यहां उपलब्ध है, जिनमें पाठ्यक्रम से जुड़ी किताबों के साथ कई दुर्लभ और शोधपरक ग्रंथ भी शामिल हैं।
लविवि के प्रवक्ता प्रो. मुकुल श्रीवास्तव ने बताया कि छात्रों और शिक्षकों के स्वैच्छिक पुस्तक दान की परंपरा ने इस पुस्तकालय के संग्रह को लगातार समृद्ध किया है। इस लाइब्रेरी की सबसे बड़ी ताकत इसकी सहकारिता भावना है।
इस पुस्तकालय के संग्रह में विज्ञान, कला, वाणिज्य, विधि और प्रबंधन जैसे विभिन्न विषयों की मानक और संदर्भ पुस्तकें शामिल हैं। यहां विदेशी प्रकाशनों की कई ऐसी दुर्लभ किताबें भी उपलब्ध हैं, जो अब बाजार में आसानी से नहीं मिलतीं।
को-ऑपरेटिव लाइब्रेरी के इंचार्ज प्रो. राघवेंद्र प्रताप के अनुसार एक छात्र एक ही वक्त में पांच पाठ्य पुस्तकें जारी करा सकता है और जरूरत के मुताबिक सत्र के दौरान उन्हें बदल भी सकता है और सत्र के दौरान आवश्यकता अनुसार उन्हें बदल भी सकता है। विद्यार्थियों की जरूरत और पाठ्यक्रम में होने वाले बदलाव के अनुसार समय-समय पर नई किताबें भी खरीदी जाती हैं।