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सुना है क्या: "माननीय का हाथ, ठेकेदार बना बलवान", "तबादलों में नेताजी को झटका", "किस्सा सरकारी गाड़ी का"

सार

राजधानी में माननीय के हाथ रखते ही एक ठेकेदार कैसे करोड़ों में खेलने लग गया। इसकी बड़ी चर्चा है। वहीं, तबादलों में नेताजी को झटका लगा है। दरअसल, इस बार तबादला उनका हुआ है जो बड़े नेता माने जाते हैं ऐसे में सभी हैरान हैं। पढ़ें ये किस्से: 
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सुना है क्या/suna hai kya - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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राजधानी में माननीय के हाथ रखते ही एक ठेकेदार कैसे करोड़ों में खेलने लग गया। इसकी बड़ी चर्चा है। वहीं, तबादलों में नेताजी को झटका लगा है। दरअसल, इस बार तबादला उनका हुआ है जो बड़े नेता माने जाते हैं ऐसे में सभी हैरान हैं। वहीं, सरकारी गाड़ी का किस्सा बड़ी चर्चा में हैं। पढ़ें, ये कानाफूसी: 

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माननीय का हाथ, ठेकेदार बना बलवान
राजधानी के पास का एक जिला अक्सर चर्चा में रहता है। इस बार नगर निगम का भ्रष्टाचार चर्चा की वजह बना है। दो अधिकारियों पर भी गाज गिरी है। इन अधिकारियों ने बड़े-बड़े टेंडर एक ही ठेकेदार को दिए। टेंडर दो-चार नहीं, बल्कि दर्जनों हैं। जिस ठेकेदार की फर्म 10-15 लाख रुपये की थी, वह कुछ ही वर्षों में सवा सौ करोड़ रुपये का कारोबार पार कर चुकी है। ठेकेदार सिर्फ एक चेहरा है। इसके पीछे सत्ताधारी दल के एक माननीय का हाथ बताया जा रहा है। चर्चा यह भी है कि ठेकेदार ने ही करोड़ों रुपये की लग्जरी कार माननीय को दी थी। कार ठेकेदार के नाम पर ही है। मतलब, माननीय की सरपरस्ती में ठेकेदार बलवान होता गया।

तबादलों में नेताजी को झटका
प्रदेश के पढ़ाई-लिखाई वाले एक विभाग में बीच सत्र में हुए तबादले काफी चर्चा में हैं। इनमें लंबे समय से जमे और अपने क्षेत्र में बड़े नेता होने का दावा करने वाले लोग भी शामिल हैं। इससे विभाग में सभी हैरान हैं। हालत यह है कि तबादला पाने वाले एक नेता जी ने पहले सूची को फर्जी करार दिया और विभाग से खंडन जारी करने के लिए पत्र भी लिख डाला। लेकिन जब उन्हें तबादले की सच्चाई पता चली तो वे सोशल मीडिया पर इसकी आलोचना करने में में जुट गए। दूसरों को आश्वासन देने वाले नेता जी खुद को ही नहीं बचा सके।
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किस्सा सरकारी गाड़ी का...
खेलों वाले विभाग में सरकारी गाड़ी को लेकर हायतौबा मची रहती है। दरअसल, विभाग में सबसे बड़े साहब के पास ही इस्तेमाल लायक सरकारी गाड़ी है। पार्किंग एरिया में पुरानी गाड़ियां हैं, लेकिन इनमें सफर करना किसी चुनौती से कम नहीं है। ऐसे में विभागीय अधिकारी या तो मजबूरी में इन गाड़ियों से सफर करते हैं या किराए पर लेकर सरकारी टूर पर जाते हैं। कुछ दिन पहले विभाग की ओर से शासन स्तर पर सरकारी गाड़ी उपलब्ध कराने का प्रस्ताव भेजा गया तो वहां से कुछ ऐसी जानकारी मांगी गई कि अधिकारियों ने सरकारी गाड़ी के बारे में सोचना ही बंद कर दिया है।
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