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Bahraich: जंगल की पगडंडी से राष्ट्रीय मंच तक, महिलाओं की गरिमा की रक्षक मनोरानी देवी अब नहीं रहीं

Wed, 03 Jun 2026 06:24 PM IST
Akash Dwivedi डिजिटल डेस्क, बहराइच

सार

बहराइच की वनवासी महिला मनोरानी देवी का निधन हृदय गति रुकने से हो गया। उन्होंने अपनी जमीन देकर सामुदायिक शौचालय निर्माण का मार्ग प्रशस्त किया था। उनके इस साहसिक कदम ने महिलाओं की गरिमा, सुरक्षा और स्वच्छता के प्रति जागरूकता बढ़ाई। उनका जीवन समाज परिवर्तन और संघर्ष की प्रेरणादायक मिसाल बना।

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मनोरानी यादव -फाइल फोटो - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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कतर्नियाघाट के जंगलों से उठी एक आवाज ने कभी देश को महिलाओं की गरिमा का अर्थ समझाया था। वह आवाज अब हमेशा के लिए थम गई है। भवानीपुर वन ग्राम की रहने वाली 51 वर्षीय मनोरानी देवी का मंगलवार को हृदय गति रुकने से निधन हो गया। 

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उनके जाने के साथ ग्रामीण स्वच्छता और महिला सम्मान के आंदोलन का एक ऐसा अध्याय समाप्त हो गया, जिसने यह साबित किया कि बदलाव की सबसे बड़ी ताकत किसी पद, प्रतिष्ठा या सत्ता में नहीं, बल्कि एक साधारण इंसान के साहस में होती है।मनोरानी देवी कोई नेता नहीं थीं। न उनके पास धन था, न प्रभाव और न ही उच्च शिक्षा। 

वह जंगल के किनारे बसे एक छोटे से गांव की अशिक्षित वनवासी महिला थीं, जिनकी जिंदगी गरीबी, संघर्ष और जिम्मेदारियों के बोझ तले बीती। लेकिन एक दिन उन्होंने ऐसा निर्णय लिया, जिसने उन्हें राष्ट्रीय पहचान दिला दी और हजारों महिलाओं के जीवन में सम्मान का उजाला भर दिया। 
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बात वर्ष 2013 की है जब भवानीपुर गांव में सामुदायिक शौचालय बनाने की सरकारी योजना आई। गांव में बैठक हुई, लेकिन शौचालय के लिए कोई भी अपनी जमीन देने को तैयार नहीं था। लोगों का कहना था कि शौचालय गांव के भीतर नहीं, बल्कि गांव से दूर जंगल में बनाया जाए। उस समय गांव की महिलाएं अंधेरा होने का इंतजार करती थीं। 

शौच के लिए जंगल जाना उनकी मजबूरी थी। हर दिन उन्हें असुरक्षा, जंगली जानवरों और सामाजिक शर्मिंदगी का सामना करना पड़ता था। बैठक में जब हर तरफ खामोशी थी, तब मनोरानी देवी खड़ी हुईं। 

उन्होंने वह बात कही, जिसने पूरे गांव की सोच को झकझोर दिया।  शौचालय गंदगी का नहीं, हमारी बहू-बेटियों की इज्जत और सुरक्षा का सवाल है। अगर कोई जमीन नहीं देगा तो मैं अपनी जमीन देती हूं। उनके इन शब्दों ने केवल एक शौचालय की नींव नहीं रखी, बल्कि ग्रामीण समाज में महिलाओं के सम्मान को लेकर नई सोच की बुनियाद भी रख दी।

 

जंगल की पगडंडी से राष्ट्रीय मंच तक

मनोरानी देवी के इस त्याग की चर्चा धीरे-धीरे गांव की सीमाओं से निकलकर प्रशासन और सामाजिक संगठनों तक पहुंची। तत्कालीन जिलाधिकारी किंजल सिंह ने इस पहल को आगे बढ़ाया। जब यह कहानी स्वच्छता आंदोलन के प्रणेता और सुलभ इंटरनेशनल के संस्थापक डॉ. बिंदेश्वर पाठक तक पहुंची, तो वे भी इस साहसिक निर्णय से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सके। और लखनऊ में आयोजित एक समारोह में मनोरानी देवी को सम्मानित किया गया।

सुलभ इंटरनेशनल ने उन्हें अपना ब्रांड एंबेसडर बनाया और दो लाख रुपये की सम्मान राशि प्रदान की। जंगल के एक छोटे से गांव की महिला का राष्ट्रीय मंच पर सम्मानित होना उस विचार की जीत थी, जिसमें महिला सम्मान को समाज के केंद्र में रखा गया।

सम्मान मिला, लेकिन जमीन से जुड़ी रहीं

राष्ट्रीय पहचान मिलने के बाद भी मनोरानी देवी का जीवन नहीं बदला। उन्होंने मंचों की चमक से ज्यादा गांवों की गलियों को चुना। वह लगातार वन गांवों और थारू बस्तियों में जाकर महिलाओं को स्वच्छता, स्वास्थ्य और शौचालयों के उपयोग के प्रति जागरूक करती रहीं। 

मासिक धर्म स्वच्छता जैसे विषयों पर भी उन्होंने बेझिझक संवाद किया। जिन मुद्दों पर ग्रामीण समाज में अक्सर बात तक नहीं होती थी, उन्हें उन्होंने चर्चा का विषय बनाया। उनके लिए सम्मान कोई उपलब्धि नहीं, बल्कि समाज को बदलने का माध्यम था।

वर्ष 1975 में भयापुरवा गांव में जन्मी मनोरानी देवी कभी स्कूल नहीं जा सकीं। कम उम्र में विवाह हुआ और वर्ष 2004 में पति की असमय मृत्यु के बाद आठ बच्चों की जिम्मेदारी उनके कंधों पर आ गई। 

मजदूरी करके परिवार पालना आसान नहीं था। लेकिन उन्होंने कभी परिस्थितियों के आगे घुटने नहीं टेके। संघर्षों की उसी आग ने उनके भीतर वह साहस पैदा किया, जिसने उन्हें समाज के लिए खड़े होने की ताकत दी।

 

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अब केवल यादें नहीं, एक विरासत छोड़ गई हैं मनोरानी

मंगलवार को उनके निधन की खबर जैसे ही फैली, पूरे क्षेत्र में शोक की लहर दौड़ गई। भवानीपुर गांव में लोगों का हुजूम उमड़ पड़ा। हर किसी के पास उनसे जुड़ी कोई न कोई स्मृति थी। कोई उन्हें महिलाओं की आवाज कह रहा था, तो कोई गांव की असली नायिका। 

मनोरानी देवी का जीवन यह संदेश देता है कि समाज में परिवर्तन के लिए बड़े संसाधनों की नहीं, बड़े इरादों की जरूरत होती है। उन्होंने अपनी जमीन देकर केवल शौचालय नहीं बनवाया, बल्कि महिलाओं के सम्मान, सुरक्षा और आत्मसम्मान के लिए एक स्थायी स्मारक खड़ा किया।

आज कतर्नियाघाट के जंगलों में शायद पहले जैसी खामोशी हो, लेकिन उस महिला की आवाज, जिसने कहा था बहू-बेटियों की इज्जत सबसे पहले आने वाले वर्षों तक समाज को रास्ता दिखाती रहेगी। “जिस महिला ने अपनी जमीन देकर हजारों महिलाओं की गरिमा की रक्षा का रास्ता खोला, वह अब इस दुनिया में नहीं है। लेकिन उनका साहस और संदेश आने वाली पीढ़ियों के लिए प्रेरणा बनकर जीवित रहेगा।”

 
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