रूसी दार्शनिक दोस्तोयेव्स्की का कथन है कि मनुष्य दुखों को लंबे समय तक याद रखता है और खुशियों को जल्दी भूल जाता है। नए साल के एक महीने बाद यह बात और ज्यादा साफ दिखाई देने लगती है। जनवरी का शोर अब थम चुका है। बधाइयों की गूंज, संकल्पों की सूची और उम्मीदों की चमक धीरे-धीरे सामान्य दिनचर्या में घुल चुकी है।
छोटे बदलाव, बड़ी राहत
महिलाओं के लिए घर केवल रहने की जगह नहीं, बल्कि ऊर्जा का केंद्र होता है। अब जब नया साल नया नहीं रहा, तो घर और सोच में छोटे बदलाव बड़ी राहत दे सकते हैं।
स्वस्थ शरीर, स्थिर मन
साल की असली शुरुआत वहीं से होती है, जहां शरीर और मन साथ चलते हैं। अब संकल्पों की जगह आदतें बनानी होंगी,
ये छोटी बातें ही बड़े बदलाव की जड़ होती हैं।
एक्सपर्ट की राय
दिल्ली विश्वविद्यालय के आर्यभट्ट कॉलेज में मनोविज्ञान की असिस्टेंट प्रोफेसर डॉ. नुपुर गोसाईं कहती हैं, “नया साल बीत जाने के बाद लोग खुद को असफल मान लेते हैं, जबकि यही समय सबसे वास्तविक होता है। जब उत्साह खत्म हो जाए और आप फिर भी अपने लिए खड़े रहें, वही असली नई शुरुआत है।” नया साल अब बीत चुका है, लेकिन आपकी कहानी अभी चल रही है। जनवरी के बाद का समय हार मानने का नहीं, ईमानदारी से आगे बढ़ने का समय है।