- डिवीजन बेंच ने याचिकाकर्ताओं की समीक्षा याचिका खारिज की
संवाद न्यूज एजेंसी
श्रीनगर। जम्मू-कश्मीर और लद्दाख हाईकोर्ट ने शुक्रवार को स्पष्ट किया कि समीक्षा की शक्ति केवल रिकॉर्ड पर स्पष्ट गलती सुधारने के लिए इस्तेमाल की जा सकती है न कि पहले लिए गए न्यायिक मत को बदलने या फिर से मूल्यांकन करने के लिए।
जस्टिस राजनेश ओसवाल और जस्टिस मोहम्मद यूसुफ वानी की डिवीजन बेंच ने शुक्रवार को याचिकाकर्ताओं शाहजहां राथर और अन्यों की ओर से दाखिल की गई समीक्षा याचिका खारिज कर दी। याचिकाकर्ताओं ने इस साल 9 अप्रैल के फैसले पर पुनर्विचार की मांग की थी जिसमें उनकी याचिका खारिज कर दी गई थी। वह याचिका सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल, जम्मू के 2021 के आदेश को चुनौती देती थी।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि उनके सबमिशन पर पर्याप्त विचार नहीं किया गया और अधिकारियों द्वारा कुछ दावों का स्पष्ट खंडन न करने को स्वीकार मान लिया जाना चाहिए। हालांकि, कोर्ट ने कहा कि समीक्षा याचिका में उठाए गए मुद्दे पहले ही मूल फैसले में जांचे और तय किए जा चुके हैं।
बेंच ने कहा कि समीक्षा वाले फैसले में पैरा 13 और 15 में कैजुअल असाइनीज से जुड़े याचिकाकर्ताओं के दावों पर विचार किया गया था। कोर्ट ने यह भी नोट किया कि 1 अक्टूबर 2024 के आदेश के अनुपालन में अधिकारियों द्वारा दाखिल हलफनामे में कोर्ट आदेशों के तहत काम कर रहे 18 व्यक्तियों का विवरण दिया गया जो याचिकाकर्ताओं द्वारा सूचना के अधिकार के तहत प्राप्त जानकारी से मेल खाता था। हाईकोर्ट ने कहा कि समीक्षा का इस्तेमाल तय मुद्दों को फिर से उठाने या पार्टी द्वारा गलत समझी गई व्याख्या सुधारने के लिए नहीं किया जा सकता।
बेंच ने कहा, यह मुद्दा कि कोर्ट ने किसी भी पक्ष के रुख की सही व्याख्या की है या नहीं, समीक्षा का विषय नहीं हो सकता। समीक्षा का दायरा बहुत सीमित है और इसे तय मुद्दों की फिर से सुनवाई तक नहीं बढ़ाया जा सकता। हाईकोर्ट ने कहा, भले ही मान लिया जाए कि कोर्ट का लिया गया मत सही नहीं है, तब भी यह समीक्षा का आधार नहीं बन सकता।