दक्षिण कश्मीर में पर्यटकों की बढ़ती संख्या से पर्यावरण को लेकर चिंता
अमर उजाला ब्यूरो
श्रीनगर। कश्मीर घाटी शानदार पहाड़ियों, हरे-भरे घास के मैदानों, चमकती झीलों, झरनों, चश्मों और घने जंगलों के लिए दुनिया भर में मशहूर है। हर साल भारत और विदेशों से हजारों पर्यटकों को अपनी ओर खींचते हैं। पर्यटन स्थानीय लोगों की आजीविका के मुख्य स्रोतों में से एक है और क्षेत्र की अर्थव्यवस्था में अहम योगदान देता है।
पहलगाम की बैसरन घाटी में हाल ही में हुए आतंकवादी हमले के बाद कई प्रमुख पर्यटन स्थलों को पर्यटकों के लिए कुछ समय के लिए बंद कर दिया गया था। नतीजतन बड़ी संख्या में पर्यटकों ने दक्षिण कश्मीर, शोपियां और पुलवामा के खूबसूरत नजारों की ओर रुख किया है।
पर्यटकों की बढ़ती संख्या से स्थानीय समुदायों के लिए आर्थिक अवसर पैदा हुए हैं लेकिन इससे पर्यावरण संबंधी चुनौतियां भी खड़ी हुई हैं। स्थानीय निवासियों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं ने पूरे क्षेत्र के जंगलों, घास के मैदानों और पिकनिक स्थलों पर प्लास्टिक कचरे, खाने-पीने की चीजों के रैपर, बोतलों और अन्य कचरे के बढ़ते ढेर पर चिंता जताई है।
स्थानीय लोगों को डर है कि अगर कचरा प्रबंधन के सही उपाय नहीं किए गए तो ये बेदाग प्राकृतिक आकर्षण धीरे-धीरे अपना आकर्षण और पारिस्थितिक महत्व खो सकते हैं। उन्होंने पर्यटकों और स्थानीय निवासियों से जिम्मेदारी से काम करने और पर्यावरण की दृष्टि से संवेदनशील इलाकों में कूड़ा-कचरा न फैलाने की अपील की है।
विशेषज्ञों का मानना है कि सही योजना, बुनियादी ढांचे के विकास और संरक्षण के प्रयासों से ये पर्यटन स्थल स्थानीय युवाओं के लिए रोजगार के अवसर पैदा कर सकते हैं। साथ ही क्षेत्र की प्राकृतिक सुंदरता को भी बचाए रख सकते हैं। उन्होंने सरकार से पर्यावरण संरक्षण के उपायों को मजबूत करने, कचरा निपटान की पर्याप्त सुविधाएं उपलब्ध कराने और टिकाऊ पर्यटन को बढ़ावा देने की मांग की है। स्थानीय निवासियों ने पर्यटकों से अपील की है कि वे जिम्मेदारी से कचरे का निपटान करके कश्मीर को साफ रखने में मदद करें।