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Uttarakhand: उत्तराखंड में जंगल की आग के 4879 अलर्ट, सिर्फ 12.5% ही सही; क्या सिस्टम पर भारी पड़ रही लापरवाही?

सार

उत्तराखंड में जंगल की आग को लेकर भेजे गए 4879 अलर्ट में सिर्फ 12.5 प्रतिशत ही सही पाए गए। बाकी अलर्ट खेतों की आग, नियंत्रित आग, गैर-वन क्षेत्रों या गलत सूचना से जुड़े थे। पर्यावरण संबंधी संसदीय समिति ने इस व्यवस्था पर चिंता जताई है। सवाल है कि जब जंगल की आग रोकने के लिए पैसा और तकनीक मौजूद है, तो क्या गलत अलर्ट असली आग के खतरे को बढ़ा रहे हैं? आइए, सबकुछ विस्तार से जानते हैं...

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भारत के पास तकनीक और पैसा फिर भी समस्या बरकरार - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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हिमालयी राज्यों में जंगल की आग से निपटने की व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े हुए हैं। उत्तराखंड में इस आग के मौसम में फॉरेस्ट सर्वे ऑफ इंडिया से 4,879 फायर अलर्ट मिले, लेकिन इनमें सिर्फ 12.5 प्रतिशत अलर्ट ही असली जंगल की आग से जुड़े पाए गए। यानी करीब 87.5 प्रतिशत अलर्ट ऐसी जगहों के थे, जहां जंगल में आग नहीं लगी थी। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि गलत अलर्ट की इतनी बड़ी संख्या असली आग की सूचना मिलने पर कार्रवाई को प्रभावित तो नहीं कर रही है।

क्या ज्यादातर फायर अलर्ट गलत निकल रहे हैं?

इन अलर्ट में खेतों में जलाई गई आग, नियंत्रित तरीके से लगाई गई आग, गैर-वन क्षेत्र और गलत अलर्ट शामिल थे। पर्यावरण संबंधी संसदीय समिति ने इस स्थिति पर नाराजगी जताई है। समिति का कहना है कि अगर लगातार गलत अलर्ट आते रहे तो अधिकारियों में असली आग के अलर्ट को भी गंभीरता से नहीं लेने की आदत बन सकती है। इससे जंगल में लगी आग पर समय रहते कार्रवाई करने में देरी का खतरा बढ़ सकता है।

जंगल की आग रोकने के लिए कितना पैसा मिला?

समिति ने कहा है कि देश में जंगल की आग से निपटने के लिए नीति, तकनीक और पैसा मौजूद है, लेकिन सबसे बड़ी समस्या इनके सही इस्तेमाल की है। जंगल की आग से जुड़े अलर्ट सिस्टम से करीब 4.74 लाख लोग पंजीकृत हैं। वर्ष 2020-21 से 2025-26 के बीच राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को इस योजना के तहत 186.81 करोड़ रुपये की सहायता दी गई। हिमाचल प्रदेश को 59.59 करोड़ और उत्तराखंड को 54.56 करोड़ रुपये मिले।

क्या जंगल की आग पर 24 घंटे नजर नहीं रखी जा रही?

समिति ने आग की निगरानी के लिए मौजूदा व्यवस्था पर भी सवाल उठाए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक भारत अंतरिक्ष के क्षेत्र में मजबूत होने के बावजूद जंगल की आग की निगरानी के लिए विदेशी उपग्रहों पर निर्भर है। मौजूदा व्यवस्था में दिन के कई घंटों तक जंगलों पर लगातार नजर नहीं रखी जा पाती। रिपोर्ट के अनुसार रात 1:30 बजे से सुबह 10:30 बजे तक और दोपहर 1:30 बजे से रात 10:30 बजे तक निगरानी में बड़ा अंतर रहता है।

क्या अपना सैटेलाइट ही आग से बचाव का रास्ता है?

निगरानी व्यवस्था में लंबे अंतर का मतलब है कि जंगल में आग लगने के बाद उसकी जानकारी मिलने में कई घंटे लग सकते हैं। इस दौरान आग फैलकर बड़े इलाके को अपनी चपेट में ले सकती है। संसदीय समिति ने अंतरिक्ष विभाग से हिमालयी इलाकों के लिए ऐसा अपना सैटेलाइट बनाने और लॉन्च करने को प्राथमिकता देने को कहा है, जो 24 घंटे जंगल की आग पर नजर रख सके। समिति ने यह भी कहा है कि सिर्फ आग बुझाने पर पैसा खर्च करने के बजाय उसकी रोकथाम और जंगलों को दोबारा ठीक करने पर ज्यादा ध्यान देना जरूरी है।

क्या गलत अलर्ट से बढ़ रहा जंगल की आग का खतरा?

उत्तराखंड के आंकड़े जंगल की आग की निगरानी व्यवस्था की बड़ी कमजोरी सामने रखते हैं। 4,879 अलर्ट में सिर्फ 12.5 प्रतिशत का सही निकलना बताता है कि अलर्ट सिस्टम को ज्यादा सटीक बनाने की जरूरत है। साथ ही हिमालयी क्षेत्रों में लगातार निगरानी के लिए बेहतर तकनीक की जरूरत भी सामने आई है। अगर असली आग की सूचना समय पर नहीं मिली तो शुरुआती स्तर पर उसे रोकना मुश्किल हो सकता है। इसलिए समिति ने तकनीक के बेहतर इस्तेमाल, रोकथाम और निगरानी व्यवस्था मजबूत करने पर जोर दिया है।

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