जिस दिन मूर्ति का चयन होना था, उस दिन आपके मन में क्या भाव चल रहे थे?
अरुण योगीराज: 10 दिसंबर को मैं मैसूर चला गया था, फिर 22 दिसंबर को अयोध्या लौट आया। वहां सारे ट्रस्टी आने वाले थे। मूर्ति के ऊपर मैंने पीला वस्त्र डाल रखा था। मैं ट्रस्ट के सदस्यों को हिंदी में अपनी विचार प्रक्रिया बता रहा था। मेरा पहले दिन से उद्देश्य यह नहीं था कि ट्रस्ट मेरी बनाई मूर्ति को स्वीकार करे। मेरा उद्देश्य था कि देश के गरीब लोग, युवाओं के माता-पिता जब मूर्ति को देखें तो प्रसन्न रहें। मैंने एक किताब में यह लिखकर रखा था। हर दिन मैं हजार तस्वीरों से ज्यादा देखकर सोता था। प्रभामंडल को जब डिजाइन किया तो उसमें दशावतार थे। भक्त भाग में हनुमान और गरुड़ देव थे। एक-एक इंच के लिए हमने संदर्भ जुटा रखे थे। मेरी हिंदी अच्छी नहीं है तो शायद ट्रस्टी ठीक से नहीं समझ पाए। उसी क्षण मूर्ति पर रखा पीला वस्त्र नीचे आ गया और सभी ट्रस्टी के हाथ (प्रणाम की मुद्रा में) अपने आप उठ गए। वह क्षण मुझे हमेशा याद रहेगा।
अमर उजाला के पाठकों ने आपसे सबसे ज्यादा सवाल रामलला की नई मूर्ति के नेत्रों को लेकर किए हैं। इन दिव्य चक्षुओं को इतने मोहक तरीके से कैसे गढ़ा गया?
अरुण योगीराज: मूर्ति अलंकारों में छुप गई थी। ऐसे में मुझे पता था कि नेत्रों पर पूरे देश की नजर रहेगी। हमें एक मुहूर्त दिया गया था। नेत्रोन्मिलन करने से पहले हमें सरयू नदी में स्नान करके, हनुमानगढ़ी और कनक भवन में पूजा करके नेत्र उकेरने के लिए 20 ही मिनट का समय दिया गया था। शिला पर जब काम करते हैं तो आपके पास एक ही मौका होता है। मैंने भगवान का ही स्मरण किया कि आप ही आदेश दीजिए कि कैसे बनाना है। शिल्प शास्त्र में जैसा कहा गया है, उसी तर्ज पर मैंने पहले ही उन 20 मिनटों के लिए चांदी का हथौड़ा और सोने की छेनी बनवाकर रखी थी। शिल्प शास्त्र एक ज्यामितीय माप देता है। हम उसे उत्तम पंचकाल और 64 अंगुल कहते हैं। उस ज्यामितीय माप के अंदर जीवंतता लेकर आना हमारे लिए चुनौतीपूर्ण है। मैं शिला से बात करता था। भगवान को याद करता था कि आपको दर्शन देने ही होंगे। सितंबर के पहले हफ्ते में मैंने काम शुरू किया और दो दिसंबर को खत्म किया। तीनों मूर्तिकारों में मेरा ही काम सबसे पहले खत्म हुआ। मेरे पास सात दिन थे। सातों दिन मैं मूर्ति के सामने बैठा रहता था और मन में पूछता था कि भगवान कुछ और सुधार हो तो बताइए। मैंने जिंदगी में पत्थरों के साथ बहुत वक्त बिताया है। अब मैं भरोसे से कह सकता हूं कि पत्थर मेरी बात सुनते हैं। मैं हर बार यही कहता हूं कि यह मूर्ति मैंने नहीं बनाई, भगवान ने मुझसे बनवाई है। मेरे जैसे हजारों कलाकार काम कर रहे हैं। मैं यही सोचता था कि मेरे जरिए अगर उन सभी को सम्मान मिलता है और देश को अच्छे रामलला मिले तो कितनी अच्छी बात होगी।
नेत्रों के लिए 20 मिनट ही क्यों मिले?
अरुण योगीराज: इसके लिए मुहूर्त निकाला गया था। जब मेरी मूर्ति चुन ली गई, तब चंपत जी ने मुझे फोन किया कि अभी मैसूर लौटने की तैयारी मत करो। यहीं रुको। बाद में बताया गया कि वस्त्रकार और अलंकार बनाने वाले आ रहे हैं, उनके साथ समन्व्य कीजिए। मुझे अंदर से एहसास होने लगा कि मेरी मूर्ति चुन ली गई है। मूर्ति चुने जाने के बाद नेत्रों के लिए 20 मिनट का वक्त मिला। मेरे अंदर बाद में डर बैठ गया। मूर्ति बनाने के दौरान शिला पर मशीन, छेनी-हथौड़ी चलाया गया था। बाद में जब मूर्ति बन गई तो उसे छूने से मुझे भी डरने लगा था, क्योंकि अब वो महज एक मूर्ति नहीं रह गई थी। यह सोचने लगा कि मूर्ति को कैसे गर्भगृह के अंदर लेकर जाएंगे। दो जनवरी को मुझे यह पता चल गया था कि मेरी बनाई मूर्ति की ही प्राण प्रतिष्ठा होनी है। जब आभूषण बनाने वाले माप लेने आए, तब मैं आश्वस्त हो गया।
जब यह पता चल गया कि आपकी ही मूर्ति चुनी गई है तो मन में क्या भाव आए?
अरुण योगीराज: फिर यही सोचने लगा कि देश इसे कैसे स्वीकार करेगा। प्राण प्रतिष्ठा 22 जनवरी को हुई। उस दिन भी मैं शाम को लोगों से जा-जाकर पूछता रहा कि मूर्ति आपको कैसी लगी? सभी से अच्छी प्रतिक्रिया मिला। अगले दिन यानी 23 जनवरी को करीब सात महीने बाद मैं अच्छे से सो सका।
मूर्ति की तस्वीर पहले ही वायरल हो गई। उसके पीछे की कहानी क्या थी?
अरुण योगीराज: मूर्ति जब चुनी गई तो यह चुनौती थी कि उसे गर्भगृह के अंदर ठीक से कैसे रखेंगे। एल एंड टी के इंजीनियरों ने मूर्ति को ठीक से अंदर पहुंचा दिया। उस दिन मेरा तनाव कम हुआ। दो घंटे बाद फोटो वायरल हो गई। मुझे फिर तनाव हो गया। मैंने अपनी पत्नी को भी सात महीने में कोई फोटो नहीं भेजी थी। एक महीने में कई लोग वहां आने लगे थे। शायद उस वक्त कुछ गलती हो गई। मैं और चंपतजी बहुत विचलित हो गए। मैं दो दिन कमरे में रोता रहा कि मेरे साथ ऐसा क्यों हो गया। शिला शुद्धिकरण और प्राण प्रतिष्ठा के बाद मूर्ति अलग ही हो जाती है। मैंने महसूस किया कि जो मूर्ति बनाई थी, वो बाद में अलग दिखने लगी। उस जगह का महत्व है। अच्छी तरह से प्राण प्रतिष्ठा हुई। देश को दर्शन मिले तो हम सब भूल गए कि पहले क्या हुआ था।
मूर्ति की डिजाइन की प्रेरणा कहां से मिली?
अरुण योगीराज: मूर्ति के पीछे के हिस्से जो आर्च बनता है, उसे दक्षिण भारत में प्रभामणि कहते हैं। यह अलंकार के लिए बनाया जाता है। मैंने पहले ही सोचा था कि विष्णु संप्रदाय के मुताबिक दशावतार होगा। एक स्थान ब्रह्मा और शिव को देंगे। श्रीराम सूर्यवंशी हैं तो ऊपर सूर्य बनाया। भक्त भाग में हमने हनुमान और गरुड़ देव को बनाया। इसके लिए मैंने कागज पर रेखाचित्र बनाकर ट्रस्ट के सामने रखा था। उन्होंने उस पर हामी भरी।
आपके परिवार में कौन-कौन हैं?
अरुण योगीराज: पत्नी विजेता, बेटी सान्वी और बेटा वेदांत है। पत्नी ने मुझे काफी आधार दिया। मैं ज्यादा वक्त पत्थरों के साथ बिताता हूं। बच्चों या परिवार को बहुत कम समय दे पाता हूं। मां सरस्वती, भाई सूर्यप्रकाश, बहन चेतना और चचेरा भाई यशवंत मेरे साथ ही रहते हैं। हमारा परिवार तीन सौ साल से यह काम कर रहा है। भगवान ने हमें प्रसाद दे दिया। अभी आगे की दस पीढ़ी यही काम करना चाहते हैं। बच्चों की इच्छा होगी तो सिखाने के लिए हम मौजूद हैं। बेटा अभी दो साल का है। आठ साल की बेटी की दिलचस्पी मूर्तिकला में जागने लगी है।
एमबीए कर रहे थे, तब क्या विचार आ रहे थे?
अरुण योगीराज: पढ़ाई के बाद पिताजी बीएस योगीराज शिल्पी के साथ काम करता था। मैनेजमेंट प्रशिक्षु के तौर पर एक बार दो महीने के लिए काम के सिलसिले में बाहर गया। जब लौटा, तब लगा कि मुझे यही करना है। पिताजी ने कहा कि यह सेल्स और मार्केटिंग का काम नहीं है। खुद बैठकर यह काम करना है तो करो। यह काम ऐसा नहीं है कि किसी और से करवाया जाए। उन्हें शायद लग रहा था कि एमबीए करके मैं मूर्तिकला को कारोबार के तौर पर न मान बैठूं। पिताजी से जीवन में मुझे बस प्रोत्साहन चाहिए था। पिताजी ने पहले कभी मेरी तारीफ नहीं की थी। 20 साल से मैं उनकी शाबाशी चाहता था। केदारनाथ में जब मैंने शंकराचार्यजी की मूर्ति बनाई थी, तब उन्होंने फोन पर रोते हुए मुझे कहा कि तुमने मेरे पिता का नाम आज रोशन कर दिया है। वह सबसे बड़ा प्रोत्साहन था। शाबाशी देने के एक महीने बाद पिताजी बीएस योगीराज शिल्पी गुजर गए। मूर्ति पूरी होने के बाद मुझे लगा कि काश आज पिता होते तो देखते और खुश होते। मैं यही मानता हूं कि वे ऊपर से मुझे आशीर्वाद दे रहे हैं।
कौन सा ऐसा क्षण था जो आपको याद रहेगा?
अरुण योगीराज: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी जब देश को मूर्ति समर्पित कर रहे थे, तब मैं लोगों के साथ बाहर ही था। मैं बाहर ही रहना चाहता था। मैं लोगों की प्रतिक्रिया देखना चाहता था। सबके भावुक चेहरे देखकर मुझे खुशी हुई। वह पल मैं कभी नहीं भूल सकता।
लोकप्रियता को कैसे संभाल रहे हैं?
अरुण योगीराज: मुझे लोगों से प्यार मिल रहा है। एक पत्थर, हथौड़ी और छेनी के साथ 130 करोड़ से ज्यादा लोगों का दिल जीत सकता हूं, यह मेरे लिए नया अनुभव रहा। इस वक्त मैं यही सोच रहा हूं कि इस कला में आगे और क्या कर सकता हूं।
खाली समय में आप क्या करते हैं?
अरुण योगीराज: मैं बच्चों के साथ वक्त बिताता हूं। उनके साथ खेलता हूं। फिल्में बहुत कम देखता हूं। टीवी भी बहुत कम देखता हूं। पुराने गाने सुनता हूं। हालांकि पत्नी कहती है कि आप बहुत बोरिंग हो, ड्रॉइंग बनाते रहते हैं। गदर-2 मैंने अयोध्या में देखी। काम खत्म करके रात 10 बजे का शो देखा था। बाइक पर बैठकर फिल्म देखने गया था।