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'लोगों के बीच कम से कम हो असमानता': मोहन भागवत ने बताया क्या हो विकास का लक्ष्य? बुनियादी सुविधाओं पर दिया जोर

Tue, 29 Sep 2026 08:59 PM IST
देवेश त्रिपाठी पीटीआई, यवतमाल

सार

आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने यवतमाल में कहा कि विकास का उद्देश्य समाज के हर व्यक्ति का कल्याण होना चाहिए और इसमें अंतिम व्यक्ति को प्राथमिकता मिलनी चाहिए। उन्होंने अंत्योदय की अवधारणा समझाते हुए कहा कि समाज के सबसे निचले और ऊंचे स्तर के बीच विकास का अंतर कम से कम होना चाहिए।
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आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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यवतमाल में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने मंगलवार को कहा कि विकास का उद्देश्य समाज के हर व्यक्ति का कल्याण होना चाहिए। उन्होंने कहा कि विकास की प्रक्रिया में समाज के "अंतिम व्यक्ति" को केंद्र में रखा जाना चाहिए और विकास के सबसे ऊंचे और निचले स्तर के बीच का अंतर जितना संभव हो उतना कम होना चाहिए।
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पंडित दीनदयाल उपाध्याय की जयंती के अवसर पर आयोजित एक कार्यक्रम में भागवत ने 'अंत्योदय' की अवधारणा का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि इसका अर्थ यह सुनिश्चित करना है कि समाज के अंतिम व्यक्ति का जीवन भी अधिक से अधिक सुखी हो। मोहन भागवत ने कहा, "देश तभी खुश रह सकता है, जब समाज का अंतिम व्यक्ति अधिक से अधिक खुश हो। इसी को 'अंत्योदय' कहा जाता है।"

लोगों की बुनियादी जरूरतों पर दिया भागवत ने जोर 
भागवत ने देश में विकास की गति का जिक्र करते हुए कहा कि हमारे देश में विकास निश्चित रूप से हो रहा है, लेकिन हर व्यक्ति का एक ही समय पर समान गति से विकास संभव नहीं है। उन्होंने कहा कि पहले भी देश में गरीब लोग थे, लेकिन बुनियादी जरूरतों के लिहाज से वे पूरी तरह वंचित नहीं थे।
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उनके मुताबिक गरीब परिवारों के पास घर होते थे, भले ही उनकी दीवारें पत्थर की बजाय मिट्टी की होती थीं। इसी तरह उनके पास सामाजिक जीवन के लिए पर्याप्त और ठीक कपड़े होते थे, भले ही वे रेशम के नहीं बल्कि सूती होते थे। भागवत ने कहा कि प्रत्येक व्यक्ति के लिए भोजन, कपड़ा, आवास, जीवन के लिए जरूरी शिक्षा, स्वास्थ्य के लिए दवाएं और चिकित्सा सुविधा तथा मेहमानों का सत्कार करने के साधन उपलब्ध होने चाहिए। उनके अनुसार इन बुनियादी जरूरतों की कमी नहीं होनी चाहिए।

लोगों के बीच विकास का अंतर हो न्यूनतम :आरएसएस प्रमुख
आरएसएस प्रमुख ने कहा, "लोग यह तर्क दे सकते हैं कि इतने बड़े समाज में ऐसा करना संभव भी नहीं है। हर व्यक्ति विकास के एक ही स्तर पर नहीं हो सकता। हालांकि, विकास के उच्चतम और निम्नतम स्तर के बीच का अंतर न्यूनतम रखा जाना चाहिए।"

दीनदयाल उपाध्याय के विचारों का जिक्र करते हुए भागवत ने कहा कि उन्होंने विकास की उस परिभाषा को स्वीकार नहीं किया था, जिसमें "अधिकतम लोगों का अधिकतम कल्याण" की बात कही जाती है। भागवत के मुताबिक, उपाध्याय का विचार था कि सभी के लिए कल्याण होना चाहिए।

महात्मा गांधी का जिक्र कर क्या बोले भागवत?
उन्होंने महात्मा गांधी के उस सिद्धांत का भी उल्लेख किया, जिसमें फैसले लेते समय समाज के सबसे निचले पायदान पर खड़े व्यक्ति को ध्यान में रखने की बात कही गई है। भागवत ने कहा, "जब भी आप जीवन में कुछ करें, समाज के सबसे अंतिम व्यक्ति के बारे में सोचें। खुद से पूछें कि जो मैं कर रहा हूं, क्या उसका उस व्यक्ति के जीवन पर सकारात्मक असर पड़ेगा। अगर पड़ेगा तो उसे करें। अगर नहीं पड़ेगा तो उसे करने की जरूरत नहीं है।"

उन्होंने कहा कि विकास में भोजन, कपड़ा और आवास जैसी बुनियादी जरूरतों की पूर्ति के साथ शिक्षा और स्वास्थ्य सुविधाओं तक पहुंच भी सुनिश्चित होनी चाहिए। लोगों को सम्मान के साथ जीवन जीने और दूसरों का आतिथ्य करने में सक्षम होना चाहिए। भागवत ने यह भी कहा कि विकास प्रकृति की कीमत पर नहीं होना चाहिए। विकास और पर्यावरण दोनों की रक्षा की जानी चाहिए।

किसानों से की क्या अपील?
कृषि का जिक्र करते हुए उन्होंने किसानों के कल्याण को बेहतर बनाने के साथ जमीन की सेहत बनाए रखने पर जोर दिया। उन्होंने मिश्रित खेती और जैविक खेती, पशुपालन तथा बीज, खाद और कीटनाशकों के मामले में अधिक आत्मनिर्भरता की वकालत की। उन्होंने कहा कि लक्ष्य ऐसा होना चाहिए कि किसान कर्ज के जाल में न फंसें और अधिक आत्मनिर्भर बनें। भागवत ने कहा, "समाज को विकास को आगे बढ़ाना होगा। यह केवल सरकार की जिम्मेदारी नहीं है।"

उन्होंने दीनदयाल उपाध्याय की सादगीपूर्ण जीवनशैली और जनसेवा के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को भी याद किया। भागवत ने कहा कि उपाध्याय का दर्शन केवल मनुष्य तक सीमित नहीं था, बल्कि इसमें पशु, पक्षी और प्रकृति भी शामिल थे। भागवत ने कहा कि दीनदयाल उपाध्याय का एकात्म मानववाद कोई नई अवधारणा नहीं थी, बल्कि यह पिछली पीढ़ियों की जीवनशैली से निकला था। उनके मुताबिक इसे व्यावहारिक कार्यों के जरिए लागू किया जा सकता है।
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