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Khabaron Ke Khiladi: निकाय चुनाव से पहले साथ आते सियासी परिवार, विश्लेषकों ने बताया इससे किसका कितना फायदा

Sat, 27 Dec 2025 05:05 PM IST
संध्या न्यूज डेस्क, अमर उजाला

सार

महाराष्ट्र की राजनीति में एक बार फिर हलचल बढ़ गई है। निकाय चुनावों के लिए सियासी सरगर्मी साफ देखने को मिला रही है। उद्धव ठाकरे और राज ठाकरे के साथ चुनाव लड़ने के एलान के बाद सियासी पारा और बढ़ गया है।
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महाराष्ट्र की राजनीति में बड़े बदलाव के संकेत - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
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विस्तार
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महाराष्ट्र की राजनीति में फिर हलचल है। शिवसेना-उद्धव बालासाहेब ठाकरे के मुखिया उद्धव ठाकरे और महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के नेता राज ठाकरे ने बृहन्मुंबई महानगरपालिका (बीएमसी) के चुनाव के लिए साथ आने का एलान कर दिया है। वहीं, पुणे निकाय चुनाव के लिए अजित पवार की पार्टी एनसीपी और शरद पवार की पार्टी एनसीपी-एसपी के बीच गठबंधन लगभग तय हो चुका है। अजित पवार ने कहा कि जल्द ही इसका एलान कर दिया जाएगा। निकाय चुनाव से पहले बदलते इन समीकरणों पर ही इस हफ्ते ‘खबरों के खिलाड़ी’ में चर्चा हुई। चर्चा के लिए वरिष्ठ पत्रकार समीर चौगांवकर, पूर्णिमा त्रिपाठी, हर्षवर्धन त्रिपाठी, राकेश शुक्ल और अनुराग वर्मा मौजूद रहे।

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समीर चौगांवकर: 2006 में मनसे बनाने के बाद से राज ठाकरे सफल नहीं हो पाए हैं। उद्धव ठाकरे भी महाराष्ट्र की सत्ता से बाहर हो चुके हैं। बीएमसी शिवसेना का आर्थिक आधार रहा है। इसलिए वो इसे नहीं खोना चाहते हैं। उद्धव जानते हैं कि अगर बीएमसी हाथ से निकल जाती है तो मेरे बचे हुए सांसद और विधायक अगले पांच साल बचे रहेंगे इसकी भी उम्मीद बहुत कम है। इसलिए दोनों भाई साथ आए हैं। दोनों के साथ आने के बाद नतीजों में बहुत बदलाव होगा इसकी मुझे बहुत ज्यादा उम्मीद नहीं है। शरद पवार की जहां तक बात है तो वो अपनी बेटी की भविष्य के लिए भतीजे के साथ आएंगे। 

हर्षवर्धन त्रिपाठी: ये मन बहलाने जैसा ही है। न तो साथ आने पर ताकत बढ़ेगी न ही अलग-अलग रह गई है। चाचा-भतीजे कहां हैं ये सभी को पता है। मुझे लगता है कि महाराष्ट्र की राजनीति में अभी सिर्फ एक नेता बचा है वो हैं देवेंद्र फडणवीस हैं। मुझे नहीं लगता है कि इस साथ आने पर इतनी चर्चा करने की जरूरत है। 

अनुराग वर्मा: अगर हम बदलाव की बात करते हैं तो दो परिवार हैं जो ऐसी कोशिश कर रहे हैं। पहला ठाकरे परिवार है। जो शिवसेना का वोट बैंक होता था उसका ज्यादातर हिस्सा कहीं औऱ जा चुका है। शिवसेना का बड़ा हिस्सा शिंदे के पास है। आपके पास सिर्फ बाल ठाकरे का नाम है। पवार परिवार की बात करें तो मेरा मानना है कि कभी कोई अलग था ही नहीं, जो अलग था ही नहीं तो वो जुटेगा क्या। सुप्रिया सुले के अपने भाई से भी वैसे ही संबंध है और अपने पिता से भी वैसे ही संबंध हैं। सिर्फ चुनाव चिह्न अलग हैं। घर में तो सब एक हैं। 

पूर्णिमा त्रिपाठी: जिस समय शरद पवार ने सुप्रिया सुले को अपना उत्तराधिकारी बनाया था वो उनकी बड़ी गलती थी। उन्हें राज्य का काम अजित पवार को सौंप देना चाहिए था। देर-सबेर ही सही अब शायद उन्होंने कोर्स करेक्शन पर काम करना शुरू कर दिया है। ये वहां की राजनीति में अपनी प्रासंगिकता बनाए रखने की कोशिश है। ठाकरे बंधुओं के बारे में बात करें तो नाम को छोड़कर बाकी कुछ भी उन्होंने नहीं छोड़ा है। एक दूसरे की प्रासंगिकता बचाए रखने की ये भी एक छटपटाहट है। 

राकेश शुक्ल: महाराष्ट्र की सियासत में सभी गोटियां भाजपा ही सेट कर रही है। लोकसभा चुनाव के बाद जो पार्टियां ये मानकर चल रही थीं कि भाजपा के लिए चली चली की बेला है, उन्हें विधानसभा चुनाव से झटका लगा। पंचायत चुनाव ने उनकी चिंता को और बढ़ा दिया है। इसलिए निकाय चुनाव से पहले ये सब हो रहा है।

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