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भर्ती परीक्षा में सही जवाब पर जजों की राय जुदा: सुप्रीम कोर्ट ने कहा- अब आम विधि स्नातकों से उम्मीद उचित नहीं

Thu, 19 Mar 2026 06:53 AM IST
Pavan राजीव सिन्हा, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ऐतिहासिक मामलों जैसे शंकरि प्रसाद, सज्जन सिंह, गोलकनाथ, केशवानंद भारती और आई.आर. कोएल्हो के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि सांविधानिक व्याख्या के इस जटिल प्रश्न पर दोनों उत्तर तार्किक रूप से सही माने जा सकते हैं। 
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सुप्रीम कोर्ट (फाइल) - फोटो : ANI
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विस्तार
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सुप्रीम कोर्ट ने एक भर्ती परीक्षा के विवादित बहुविकल्पीय प्रश्न को लेकर दो उम्मीदवारों को राहत दी है। शीर्ष अदालत ने चंडीगढ़ नगर निगम को निर्देश दिया कि वह दोनों अभ्यर्थियों को समायोजित करने के लिए एक अतिरिक्त पद सृजित करे और उन्हें विधि अधिकारी के पद पर नियुक्त करे। दरअसल यह मामला तब जटिल हो गया, जब पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट के न्यायाधीशों के बीच सही उत्तर को लेकर मतभेद सामने आ गया था।
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एक बहुविकल्पीय प्रश्न से जुड़ा था विवाद
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने अपने फैसले में कहा है, जब सही जवाब को लेकर हाईकोर्ट के जजों की राय अलग-अलग है तो उन आम विधि स्नातक से यह उम्मीद करना बिल्कुल सही नहीं है कि वे सांविधानिक प्रावधानों की व्याख्या करके उस बहुविकल्पीय प्रश्न का सही जवाब दे पाएंगे। दरअसल यह विवाद एक बहुविकल्पीय प्रश्न से जुड़ा था, जिसमें पूछा गया था कि संविधान की कौन सी अनुसूची मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से मुक्त है। इस प्रश्न के चार विकल्प दिए गए थे। सातवीं अनुसूची, नौवीं अनुसूची, दसवीं अनुसूची और ‘इनमें से कोई नहीं’। एक अभ्यर्थी अमित कुमार शर्मा ने विकल्प डी (इनमें से कोई नहीं) को चुना, जबकि दूसरे उम्मीदवार चरणप्रीत सिंह ने विकल्प बी (नौवीं अनुसूची) को सही माना। भर्ती प्राधिकरण ने विकल्प बी को सही उत्तर घोषित किया था।

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दोनों विकल्प मान लिए गए सही
अमित कुमार शर्मा ने इस निर्णय को हाईकोर्ट में चुनौती दी। एकल पीठ ने भर्ती प्राधिकरण के निर्णय को सही ठहराया लेकिन बाद में खंडपीठ ने अलग दृष्टिकोण अपनाया। खंडपीठ  ने कहा कि भले ही अनुच्छेद 31बी के तहत नौवीं अनुसूची में शामिल कानूनों को कुछ हद तक सुरक्षा प्राप्त है, लेकिन यह पूर्ण रूप से न्यायिक समीक्षा से मुक्त नहीं है, क्योंकि यह संविधान के ‘मूलभूत ढांचा’सिद्धांत के अधीन आता है। इस प्रकार, यह कहना गलत होगा कि नौवीं अनुसूची पूरी तरह से मौलिक अधिकारों के उल्लंघन के आधार पर न्यायिक समीक्षा से बाहर है। इस आधार पर खंडपीठ ने विकल्प डी को भी सही माना।
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न्याय में देरी से योग्य अभ्यर्थी का अधिकार नहीं छीन सकते
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में ऐतिहासिक मामलों जैसे शंकरि प्रसाद, सज्जन सिंह, गोलकनाथ, केशवानंद भारती और आई.आर. कोएल्हो के निर्णयों का उल्लेख करते हुए कहा कि सांविधानिक व्याख्या के इस जटिल प्रश्न पर दोनों उत्तर तार्किक रूप से सही माने जा सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि गहराई से विश्लेषण करने पर विकल्प डी भी उतना ही सही है जितना विकल्प बी। न्यायालय ने यह भी कहा कि केवल न्यायिक प्रक्रिया में हुई देरी के कारण किसी योग्य उम्मीदवार के अधिकारों को छीना नहीं जा सकता। इसलिए दोनों अभ्यर्थियों के हितों को संतुलित करते हुए अदालत ने निर्देश दिया कि एक अतिरिक्त पद सृजित कर अमित कुमार शर्मा को भी नियुक्त किया जाए। हालांकि, चरणप्रीत सिंह की वरिष्ठता को बरकरार रखने का निर्देश दिया गया है।

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