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एक्सप्लेनर: इस्राइल में मुस्लिम आबादी की आवाज उठाने वाले सियासी दल क्यों बैन, नेतन्याहू की पार्टी कैसे बनी वजह

Sun, 27 Sep 2026 03:10 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

इस्राइल में चुनाव से पहले अरब पार्टियों पर बैन। 18% मुस्लिम आबादी, नेतन्याहू की चाल और सुप्रीम कोर्ट के दखल से क्या बदलेगा समीकरण? 
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इस्राइल में अरब दलों के चुनाव लड़ने पर बैन। - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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इस्राइल के साफ-सुथरे चुनाव कराने के लिए जिम्मेदार वहां के निर्वाचन आयोग का एक फैसला इन दिनों विवादों में हैं। दरअसल, इस्राइल में अगले महीने होने वाले आम चुनाव से पहले आयोग ने सभी 'अरब सियासी दलों' के खड़े होने पर प्रतिबंध लगा दिया है। केंद्रीय चुनाव समितिने इसी हफ्ते एक प्रस्ताव पर मतदान के बाद अपने इस फैसले का एलान किया। आदेश के मुताबिक, इस्राइल में रहने वाले अरब समुदाय का प्रतिनिधित्व करने वाले तीन दल- 27 अक्तूबर के चुनाव में हिस्सा लेने के लिए योग्य नहीं होंगे। 
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ऐसे में यह जानना अहम है कि आखिर इस्राइल में हालिया समय में मुस्लिमों और अरब आबादी के प्रतिनिधि माने जाने वाले अरब दलों को प्रतिबंधित करने का जो फैसला हुआ है, वह कौन हैं? इन्हें बैन करने का फैसला लिया क्यों गया? यहूदियों के देश के तौर पर गठित हुए इस्राइल में मुस्लिम और अन्य धर्मों की क्या आबादी है? अरब दलों के चुनाव लड़ने पर बैन में अब आगे क्या होगा? आइये जानते हैं...

पहले जानें- इस्राइल में अरब दल क्या हैं, कैसी पहचान?

इस्राइल में लगभग 20 लाख अरब नागरिक हैं, जो कुल आबादी का लगभग 21% हैं। इन अरब नागरिकों में अधिकतर मुस्लिम (करीब 83 फीसदी) हैं। इसके अलावा ईसाई और द्रूज भी अल्पसंख्यक अरब आबादी का हिस्सा हैं। 

इस्राइल की जनसांख्यिकी। - फोटो : अमर उजाला
इस्राइल में अरब दल वहां की इसी अरब-अल्पसंख्यक आबादी के मुख्य राजनीतिक प्रतिनिधि हैं। इस अरब आबादी को मुख्यतः दो चुनावी गठबंधनों (सूचियों) के जरिए चार प्रमुख राजनीतिक दलों की ओर प्रतिनिधित्व मिलता है...

1. जॉइंट लिस्ट
यह तीन अलग-अलग राजनीतिक विचारधाराओं वाले दलों का एक चुनावी गठबंधन है।

2. राअम (यूनाइटेड अरब लिस्ट)
मंसूर अब्बास के नेतृत्व वाली यह पार्टी जॉइंट लिस्ट से अलग होकर स्वतंत्र रूप से चुनाव लड़ती है। यह पार्टी इस्राइली संसद और सरकारों के साथ सीधे संवाद और सौदेबाजी के जरिए अरब बस्तियों व नगरपालिकाओं के लिए बजट, बुनियादी ढांचा और स्वास्थ्य सुविधाएं हासिल करने पर ध्यान केंद्रित करती है।

राअम वर्ष 2021-2022 में इस्राइल के सत्तारूढ़ शासकीय गठबंधन में आधिकारिक रूप से शामिल होने वाली पहली अरब पार्टी बनी थी।

ये भी पढ़ें: 'हिजबुल्ला पर हमला याद है?': यूएन के मंच पर पेजर लेकर पहुंचे नेतन्याहू, भाषण से पहले कई प्रतिनिधि बाहर निकले

इस्राइल में अरब गठबंधन- जॉइंट लिस्ट में शामिल दल। - फोटो : अमर उजाला

अब जानें- किन अरब दलों को चुनाव से प्रतिबंधित करने का फैसला हुआ?

  • इस्राइल की केंद्रीय चुनाव समिति की ओर से आगामी संसदीय चुनाव- नेसेट चुनाव से प्रमुख अरब राजनीतिक गठबंधन- जॉइंट लिस्ट और इनसे अलग होकर चुनाव लड़ने वाली- राअम को प्रतिबंधित करने का फैसला लिया गया है।
  • इसके अलावा व्यक्तिगत रूप से बलद पार्टी के अध्यक्ष सामी अबू शहादेह और हदाश पार्टी के यहूदी सांसद ओफर कासिफ को भी चुनाव लड़ने से अयोग्य ठहराने का फैसला किया गया।


चुनाव आयोग ने अरब दलों को प्रतिबंधित करने के पीछे की क्या वजह बताई?

प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू की लिकुड पार्टी और इतामार बेन-ग्विर की ओत्जमा येहुदित सहित दक्षिणपंथी गुटों ने इन दलों के खिलाफ याचिकाएं दायर की थीं। इन याचिकाओं में नेसेट के बुनियादी कानून की धारा 7ए का हवाला देते हुए कई आरोप लगाए थे।

  • जॉइंट लिस्ट पर इस्राइल राज्य के खिलाफ सशस्त्र संघर्ष का समर्थन करने तथा राअम पर आतंकवाद का समर्थन करने का आरोप लगाया गया।
  • इन दलों पर आरोप है कि वे इस्राइल के 'यहूदी' और 'लोकतांत्रिक राज्य' होने के अस्तित्व को स्वीकार नहीं करते हैं।
  • उनके खिलाफ मुख्य मामला 8 अक्तूबर 2023 को लिखे गए एक लेख पर आधारित है, जिसमें उन्होंने 7 अक्तूबर के हमले को सैन्य, राजनीतिक और रणनीतिक दृष्टि से एक अहम और ऐतिहासिक घटना बताया था। 
हालांकि, अबू शहादेह ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा था कि वे सशस्त्र संघर्ष का विरोध करते हैं और केवल नागरिक व राजनीतिक अधिकारों के लिए संघर्ष करते हैं।

इस्राइल में यहूदी और अरब आबादी। - फोटो : अमर उजाला

अरब दलों के चुनाव लड़ने पर बैन में अब आगे क्या होगा?

इस्राइल की केंद्रीय चुनाव समिति की ओर से अरब दलों- राअम, जॉइंट लिस्ट और उनके नेताओं पर लगाए गए प्रतिबंध के मामले में आगे की कानूनी प्रक्रिया और राजनीतिक परिणाम कुछ खास बातों पर निर्भर होंगे। 

1. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई और अंतिम फैसला
  • चुनाव समिति की ओर से लिया गया यह निर्णय अंतिम नहीं है। इस्राइली कानून के अनुसार, व्यक्तिगत उम्मीदवारों को अयोग्य ठहराने के लिए सुप्रीम कोर्ट की मंजूरी अनिवार्य होती है, जबकि राजनीतिक पार्टियां और सूचियां इस प्रतिबंध के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकती हैं।
  • मानवाधिकार व कानूनी अधिकारों के लिए काम करने वाला संगठन- अदाला सुप्रीम कोर्ट में इस बैन को औपचारिक रूप से चुनौती दे रहा है। कोर्ट आगामी दिनों/अगले हफ्ते इस मामले की समीक्षा करेगा।

2. अटॉर्नी जनरल का रुख
  • इस्राइल की अटॉर्नी जनरल गाली बहारव-मियारा ने स्पष्ट किया है कि राअम, जॉइंट लिस्ट और सांसद ओफर कासिफ पर प्रतिबंध लगाने के लिए कोई पर्याप्त कानूनी आधार मौजूद नहीं है। 
  • हालांकि, उन्होंने बलद नेता सामी अबू शहादेह के 8 अक्तूबर 2023 के एक लेख पर विचार करने की बात कही है। अबू शहादेह और उनके वकीलों का कहना है कि उन्होंने कभी भी हिंसा या सशस्त्र संघर्ष का समर्थन नहीं किया है।

3. सुप्रीम कोर्ट की ऐतिहासिक मिसाल और संभावना
  • इस्राइली सुप्रीम कोर्ट किसी भी राजनीतिक दल या उम्मीदवार को अयोग्य ठहराने के लिए बेहद उच्च कानूनी मानक तय करता है।
  • सुप्रीम कोर्ट ने अतीत में भी चुनाव समिति द्वारा अरब दलों पर लगाए गए प्रतिबंधों को बार-बार रद्द किया है। जैसे 2022 के चुनावों में 'बलद' पार्टी पर लगा बैन भी खारिज किया गया था)। कानूनी विशेषज्ञों का अनुमान है कि कोर्ट इस बार भी इन प्रतिबंधों को रद्द कर देगा।
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इस्राइल में अरब आबादी में भी भिन्नता। - फोटो : अमर उजाला

27 अक्तूबर के चुनाव पर आगे क्या असर पड़ेगा?

पहला परिदृश्य: अगर सुप्रीम कोर्ट प्रतिबंध रद्द कर देता है
  • राअम और जॉइंट लिस्ट संसदीय चुनाव में भाग ले सकेंगे। इससे करीब 10 लाख से अधिक अरब नागरिकों का सियासी प्रतिनिधित्व बना रहेगा।
  • सर्वेक्षणों के मुताबिक, जॉइंट लिस्ट (लगभग 7 सीटें) और राअम (लगभग 5 सीटें) मिलाकर संसद में 12 सीटें जीत सकते हैं, जो कि नेतन्याहू की मुश्किलें बढ़ा सकता है।
  • नेतन्याहू को सत्ता से हटाने के लिए विपक्षी गठबंधन- गादी आइजेनकोट की याशर पार्टी को 61 सीटों के बहुमत तक पहुंचने में अरब दल उसकी मदद कर सकते हैं।
  • अगर सुप्रीम कोर्ट प्रतिबंध हटाता है, तो प्रधानमंत्री नेतन्याहू इस फैसले का इस्तेमाल न्यायपालिका के खिलाफ अपने समर्थकों को गोलबंद करने के लिए कर सकते हैं।

दूसरा परिदृश्य: अगर सुप्रीम कोर्ट प्रतिबंध बरकरार रखता है
  • अगर प्रतिबंध कायम रहता है, तो दोनों प्रमुख अरब गठबंधनों के बाहर होने से लगभग 21% अरब नागरिक आबादी का नेसेट में प्रतिनिधित्व लगभग खत्म हो जाएगा।
  • इससे विपक्षी दलों के लिए 61 सीटों का बहुमत जुटाना लगभग असंभव हो जाएगा, जिससे नेतन्याहू के दक्षिणपंथी गठबंधन को सीधा रणनीतिक लाभ मिलेगा।
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