इंडिया गठबंधन के गठन के तीन साल बाद विपक्षी दल एक बार फिर उसी सवाल के सामने खड़े हैं, जिसे सुलझाने के लिए सितंबर 2023 में दिल्ली में बैठक हुई थी। तब सीट बंटवारे, चुनावी अभियान में तालमेल और गठबंधन को मजबूत चुनावी ताकत बनाने के लिए 14 सदस्यीय समन्वय समिति बनाई गई थी। समिति को गठबंधन का सबसे बड़ा निर्णय लेने वाला मंच माना गया था, लेकिन 13 सितंबर 2023 को हुई पहली बैठक ही उसकी आखिरी बैठक साबित हुई। इसके बाद समिति लगभग खत्म हो गई और अब गठबंधन के सामने सहयोगी दलों के बीच मतभेद सुलझाने के लिए कोई स्थायी राष्ट्रीय मंच नहीं है।
सितंबर 2023 की मुंबई बैठक में 14 सदस्यीय समन्वय समिति में 13 दलों के प्रतिनिधि तय किए गए थे। कांग्रेस से केसी वेणुगोपाल, तत्कालीन अविभाजित राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी से शरद पवार, द्रमुक से टीआर बालू, झारखंड मुक्ति मोर्चा से हेमंत सोरेन, शिवसेना यूबीटी से संजय राउत, राजद से तेजस्वी यादव, तृणमूल कांग्रेस से अभिषेक बनर्जी, आम आदमी पार्टी से राघव चड्ढा, समाजवादी पार्टी से जावेद अली खान, जनता दल यूनाइटेड से ललन सिंह, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी से डी राजा, नेशनल कॉन्फ्रेंस से उमर अब्दुल्ला और पीडीपी से महबूबा मुफ्ती शामिल थे। एक सीट माकपा के लिए रखी गई थी, लेकिन उसने अपना प्रतिनिधि नहीं चुना। इसके बाद समिति की कोई दूसरी बैठक नहीं हुई।
पहली बैठक में सहयोगी दलों ने तय किया था कि राज्यों में सीट बंटवारे पर बातचीत तुरंत शुरू की जाएगी और इसे जल्द से जल्द पूरा किया जाएगा। गठबंधन की पहली सार्वजनिक रैली भोपाल में अगले महीने करने की घोषणा भी हुई थी। लेकिन कुछ ही दिनों में भोपाल की रैली का विचार छोड़ दिया गया। सीट बंटवारे पर बातचीत कई महीनों तक चलती रही, लेकिन केंद्रीय समन्वय समिति फिर कभी नहीं बैठी। विपक्षी खेमे के एक नेता के मुताबिक गठबंधन के लिए केंद्रीय समिति का मॉडल व्यावहारिक नहीं था, क्योंकि सहयोगी दलों के बीच पहले से ही कई मतभेद मौजूद थे। इसके बजाय राज्यों की परिस्थितियों के हिसाब से अलग-अलग चुनावी समझौते करना ज्यादा कारगर माना गया।
राज्यवार रणनीति ने 2024 के लोकसभा चुनाव में इंडिया गठबंधन को कुछ बड़ी सफलताएं दिलाईं। गठबंधन के दलों ने कुल 234 सीटें जीतीं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस ने मिलकर 80 में से 43 सीटें जीतीं। महाराष्ट्र में विपक्षी गठबंधन ने 48 में से 30 सीटें हासिल कीं। तमिलनाडु में द्रमुक के नेतृत्व वाले गठबंधन ने शानदार प्रदर्शन किया। हालांकि बिहार, झारखंड, गुजरात और दिल्ली में विपक्ष का प्रदर्शन कमजोर रहा। पश्चिम बंगाल और पंजाब में गठबंधन के घटक दल अलग-अलग चुनाव लड़े। इससे साफ हुआ कि जहां स्थानीय स्तर पर सीटों और रणनीति को लेकर तालमेल बना, वहां गठबंधन को फायदा हुआ, लेकिन हर राज्य में एक जैसा मॉडल काम नहीं कर सका।
लोकसभा चुनाव के बाद विधानसभा चुनावों में विपक्षी एकता की तस्वीर और असमान हो गई। महाराष्ट्र में लोकसभा चुनाव में शानदार प्रदर्शन के कुछ महीनों बाद विपक्ष को बड़ी हार का सामना करना पड़ा। हरियाणा में कांग्रेस और आम आदमी पार्टी के बीच गठबंधन नहीं बन सका और दोनों ने अलग-अलग चुनाव लड़ा। दिल्ली में भी 2025 में दोनों दल अलग-अलग मैदान में उतरे, जहां भाजपा ने आम आदमी पार्टी को सत्ता से बाहर कर दिया और कांग्रेस एक बार फिर कोई सीट नहीं जीत सकी। बिहार और असम में विपक्ष को हार मिली। केरल और पश्चिम बंगाल में भी गठबंधन के घटक दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते रहे।
कई राज्यों में चुनावी तालमेल के बावजूद सहयोगी दलों के रिश्तों में तनाव सामने आया है। झारखंड में झामुमो-कांग्रेस-राजद गठबंधन ने 2024 में आसानी से सत्ता बरकरार रखी, लेकिन इसके बाद कांग्रेस नेताओं ने सरकार में प्रतिनिधित्व और झामुमो के साथ तालमेल को लेकर शिकायतें कीं। जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस और कांग्रेस ने मिलकर विधानसभा चुनाव लड़ा और जीतने वाले पक्ष में रहे, लेकिन बाद में सत्ता में हिस्सेदारी को लेकर दोनों दलों के रिश्ते खराब हुए। इस महीने वंदे मातरम् के पूरे संस्करण को सरकारी कार्यक्रम में प्रस्तुत किए जाने पर कांग्रेस की आपत्ति के बाद नेशनल कॉन्फ्रेंस की प्रतिक्रिया ने भी दोनों के बीच मतभेद को सार्वजनिक कर दिया।
आम आदमी पार्टी पिछले साल इंडिया गठबंधन से बाहर हो गई थी। इसके बाद पंजाब में उसका कांग्रेस के साथ टकराव लगातार बढ़ता गया है। गोवा में पार्टी ने रविवार को गोवा फॉरवर्ड पार्टी के साथ मिलकर भाजपा और कांग्रेस दोनों से अलग राजनीतिक विकल्प पेश करने का फैसला किया। गुजरात में भी आम आदमी पार्टी अकेले चुनाव लड़ने की तैयारी में है। इसका सीधा असर विपक्षी एकता की उस कोशिश पर पड़ता है, जिसमें अलग-अलग राज्यों में भाजपा के खिलाफ संयुक्त मोर्चा बनाने की कल्पना की गई थी।
तमिलनाडु में कांग्रेस और द्रमुक का गठबंधन इंडिया गठबंधन के सबसे मजबूत राज्यस्तरीय गठबंधनों में माना जाता था। 2024 के लोकसभा चुनाव में इस गठबंधन ने विपक्ष के प्रदर्शन में महत्वपूर्ण योगदान दिया था। लेकिन 2026 के विधानसभा चुनाव से पहले यह साझेदारी टूट गई। कांग्रेस द्रमुक के नेतृत्व वाले मोर्चे से अलग होकर सत्तारूढ़ टीवीके के नेतृत्व वाले गठबंधन में शामिल हो गई। तमिलनाडु का घटनाक्रम बताता है कि राष्ट्रीय स्तर पर साथ आने वाले दलों के लिए राज्य की राजनीति में अपने हितों को लेकर समझौता करना कितना मुश्किल हो सकता है।
अगले साल उत्तर प्रदेश, पंजाब, गुजरात, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, गोवा और मणिपुर में विधानसभा चुनाव होने हैं। इन राज्यों में इंडिया गठबंधन के कई दल कुछ जगह सहयोगी हैं, कुछ जगह एक-दूसरे के प्रतिद्वंद्वी हैं और कुछ जगह संभावित साझेदार हैं। उत्तर प्रदेश में समाजवादी पार्टी और कांग्रेस दोनों कह चुके हैं कि उनका गठबंधन विधानसभा चुनाव तक जारी रहेगा। लेकिन विधानसभा की 403 सीटों का बंटवारा लोकसभा की 80 सीटों के बंटवारे से कहीं ज्यादा कठिन हो सकता है। सीटों की संख्या, स्थानीय उम्मीदवार और क्षेत्रीय प्रभाव जैसे मुद्दे दोनों दलों के लिए बड़ी चुनौती बन सकते हैं।
इस साल 8 जून को विपक्षी नेताओं ने दो साल से अधिक समय के बाद पहली बड़ी औपचारिक बैठक की थी। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खरगे ने घोषणा की थी कि अब सहयोगी दल हर दो महीने में बैठक करेंगे। इसके बाद अगस्त में हैदराबाद में बैठक प्रस्तावित की गई थी, लेकिन यह बैठक नहीं हो सकी। विपक्ष के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक अब कांग्रेस की ओर से अगली बैठक की तारीख का इंतजार किया जा रहा है। उन्होंने कहा कि हैदराबाद की बैठक क्यों नहीं हो सकी, इस पर कांग्रेस की ओर से कोई जानकारी नहीं दी गई है। कांग्रेस के एक वरिष्ठ नेता ने भी कहा कि उन्हें इसकी जानकारी नहीं है।
इंडिया गठबंधन के सामने सबसे बड़ी समस्या यही है कि सहयोगी दलों के बीच विवाद होने पर अंतिम स्तर पर हस्तक्षेप करने वाला कोई स्थायी मंच नहीं है। शुरुआत में बनाई गई समन्वय समिति केवल एक बैठक के बाद निष्क्रिय हो गई। इसके बाद राज्यों के हिसाब से अलग-अलग समझौते किए गए। यह तरीका लोकसभा चुनाव में कुछ जगह सफल रहा, लेकिन विधानसभा चुनावों में इसकी सीमाएं सामने आईं। जब दो सहयोगी दल किसी राज्य में एक-दूसरे के खिलाफ खड़े होते हैं, तब राष्ट्रीय स्तर की साझा रणनीति कमजोर पड़ती है। यही वजह है कि अब गठबंधन के लिए समन्वय की कोई व्यवस्था बनाना फिर महत्वपूर्ण हो गया है।
मतभेदों के बावजूद विपक्षी दल कुछ राष्ट्रीय मुद्दों पर एक साथ आते रहे हैं। हाल में विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर के मुद्दे पर विपक्षी दलों ने भारत के मुख्य न्यायाधीश को संयुक्त पत्र भेजा था। संसद में भी विपक्षी दल कुछ मामलों में साथ खड़े हुए हैं। परिसीमन से जुड़े संविधान संशोधन विधेयक को हराने के लिए भी उन्होंने एकजुट होकर काम किया। इससे पता चलता है कि गठबंधन पूरी तरह निष्क्रिय नहीं हुआ है। समस्या यह है कि साझा राष्ट्रीय मुद्दों पर एकता और राज्यस्तरीय चुनावी रणनीति के बीच तालमेल नहीं बन पा रहा है।
इंडिया गठबंधन ने 2023 में जिस उद्देश्य के साथ शुरुआत की थी, उसमें चुनावी तालमेल सबसे अहम था। 2024 के लोकसभा चुनाव में कई राज्यों में इसका फायदा भी मिला। लेकिन इसके बाद अलग-अलग विधानसभा चुनावों में सहयोगियों के बीच दूरी बढ़ती गई। दो मूल सदस्यों का अब भाजपा के खेमे में जाना भी गठबंधन की बदलती तस्वीर को दिखाता है। अब अगले चुनावी चक्र में उत्तर प्रदेश समेत सात राज्यों के चुनाव होने हैं। ऐसे में गठबंधन के सामने केवल सीट बंटवारे का सवाल नहीं है, बल्कि यह तय करना भी जरूरी है कि मतभेद होने पर फैसला कौन करेगा और सहयोगियों को एक साथ कैसे रखा जाएगा। तीन साल पहले बनी समन्वय समिति की एकमात्र बैठक के बाद अब अगला चुनावी दौर फिर इसी व्यवस्था की परीक्षा लेने जा रहा है।