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एक्सप्लेनर: विपक्ष कर रहा मुख्य चुनाव आयुक्त के इस्तीफे की मांग, लेकिन इसे लेकर क्या कहता है देश का संविधान?

Fri, 25 Sep 2026 04:12 PM IST
रिया दुबे स्पेशल डेस्क, अमर उजाला

सार

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग ने एक बार फिर चुनाव आयोग की संवैधानिक स्वतंत्रता और उसके प्रमुख को मिले सुरक्षा प्रावधानों पर बहस छेड़ दी है। लेकिन सीईसी को हटाने की प्रक्रिया क्या इतनी आसान है? इसे लेकर संविधान में क्या प्रावधान हैं? आइए जानते हैं।
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सीईसी ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग - फोटो : Amar Ujala
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विस्तार
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मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को हटाने की मांग को लेकर विपक्ष महाभियोग प्रस्ताव लाने की तैयारी कर रहा है।  कांग्रेस के सूत्रों के मुताबिक, समाजवादी पार्टी और वाम दलों के सहयोग से अगले दो सप्ताह में यह प्रस्ताव लाया जाएगा। इस प्रस्ताव पर राज्यसभा के 56 और लोकसभा के 100 से ज्यादा सांसद हस्ताक्षर करेंगे।

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ऐसे में सवाल है कि पूरा मामला क्या है? मुख्य चुनाव आयुक्त को आखिर हटाया कैसे जा सकता है? इसके लिए कितने सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं? इसकी पूरी प्रक्रिया क्या है? क्या इससे पहले किसी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाया गया है? 2023 के नए कानून क्या-क्या बदलाव किए गए? आइये जानते हैं...

आखिर पूरा मामला क्या है?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग के बीच निर्वाचन आयोग के कामकाज और मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर को लेकर विपक्ष लगातार सवाल उठाता रहा है। हाल ही में चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के बीच मतभेद की खबरें सामने आने के बाद विपक्ष के हमले और तेज हो गए हैं। गुरुवार को नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रेस कॉन्फ्रेंस करके ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग की। शुक्रवार को उनके खिलाफ देशभर में प्रदर्शन हुए।   

चुनाव आयोग के अधिकारी - फोटो : Amar Ujala

मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से कैसे हटाया जा सकता है?

निर्वाचन आयोग की स्वतंत्रता बनाए रखने के लिए संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त के कार्यकाल को लेकर कड़े सुरक्षा प्रावधान किए गए हैं। संविधान के अनुच्छेद 324(5) के तहत चुनाव आयुक्तों और क्षेत्रीय चुनाव आयुक्तों की सेवा शर्तें और कार्यकाल, संसद द्वारा बनाए गए कानून के अधीन, राष्ट्रपति तय करते हैं। इसमें मुख्य चुनाव आयुक्त को लेकर विशेष प्रावधान है।

मुख्य चुनाव आयुक्त को सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह और उन्हीं आधारों पर पद से हटाया जा सकता है। साथ ही, नियुक्ति के बाद उनकी सेवा शर्तों में उनके नुकसान के लिए बदलाव नहीं किया जा सकता।

वहीं, किसी अन्य चुनाव आयुक्त या क्षेत्रीय चुनाव आयुक्त को मुख्य चुनाव आयुक्त की सिफारिश के बिना पद से नहीं हटाया जा सकता। इसके बाद संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति, सेवा शर्त और कार्यकाल अधिनियम, 2023 बनाया। इस कानून में भी मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए संविधान में तय इसी प्रक्रिया को बरकरार रखा गया है।

सीईसी ज्ञानेश कुमार - फोटो : Amar Ujala

सीईसी को हटाने का आधार क्या?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के आधार संविधान में सीमित हैं। उन्हें केवल सिद्ध कदाचार या अक्षमता के आधार पर हटाया जा सकता है। यानी केवल किसी फैसले से असहमति या राजनीतिक विवाद अपने आप में हटाने का आधार नहीं है। हटाने के लिए कदाचार या अक्षमता का आधार होना और उसकी प्रक्रिया के तहत जांच होना जरूरी है।

राजनीतिक चर्चा में मुख्य चुनाव आयुक्त या जज को हटाने की प्रक्रिया को अक्सर महाभियोग कहा जाता है। हालांकि, संविधान में तकनीकी रूप से 'महाभियोग' शब्द राष्ट्रपति को हटाने की प्रक्रिया के लिए इस्तेमाल किया गया है। यह अनुच्छेद 61 में दिया गया है। जजों और मुख्य चुनाव आयुक्त के मामले में संवैधानिक रूप से इसे पद से हटाने की प्रक्रिया कहा जाता है।

क्या है प्रक्रिया? - फोटो : Amar Ujala

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया क्या है?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया सुप्रीम कोर्ट के जज को हटाने की प्रक्रिया के समान है। इसमें न्यायाधीश जांच अधिनियम, 1968 के तहत जांच की प्रक्रिया भी शामिल है।

1. संसद में प्रस्ताव
  • मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के आधार बताते हुए प्रस्ताव संसद के किसी भी सदन में पेश किया जा सकता है।
  • अगर प्रस्ताव लोकसभा में लाया जाता है तो उस पर कम से कम 100 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।
  • अगर प्रस्ताव राज्यसभा में लाया जाता है तो कम से कम 50 सांसदों के हस्ताक्षर जरूरी हैं।
हस्ताक्षर वाला प्रस्ताव संबंधित सदन के पीठासीन अधिकारी को सौंपा जाता है। लोकसभा में यह प्रस्ताव लोकसभा अध्यक्ष और राज्यसभा में राज्यसभा के सभापति के पास जाता है।

2. प्रस्ताव स्वीकार या खारिज
लोकसभा अध्यक्ष या राज्यसभा के सभापति के पास प्रस्ताव को स्वीकार या खारिज करने का अधिकार होता है। अगर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया जाता है तो आरोपों की जांच के लिए तीन सदस्यीय समिति बनाई जाती है। इस समिति में शामिल होते हैं:
  • सुप्रीम कोर्ट के एक जज
  • किसी हाईकोर्ट के एक मुख्य न्यायाधीश
  • एक प्रतिष्ठित विधिवेत्ता
3. आरोपों की जांच
  • तीन सदस्यीय समिति मुख्य चुनाव आयुक्त पर लगाए गए आरोपों की जांच करती है।
  • इस दौरान मुख्य चुनाव आयुक्त को अपना पक्ष रखने और अपना बचाव करने का अधिकार होता है।
  • अगर समिति को लगता है कि लगाए गए आरोप साबित नहीं हुए हैं, तो प्रस्ताव खत्म हो जाता है और प्रक्रिया वहीं रुक जाती है।

अगर समिति यह पाती है कि मुख्य चुनाव आयुक्त के खिलाफ कदाचार साबित हुआ है या वे अक्षमता के आधार पर पद पर बने रहने में सक्षम नहीं हैं, तो समिति अपनी रिपोर्ट उस सदन में पेश करती है, जहां से हटाने का प्रस्ताव शुरू हुआ था।

4. दोनों सदनों में मतदान
इसके बाद मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने का प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों में पारित होना जरूरी है। इसके लिए विशेष बहुमत चाहिए। विशेष बहुमत के लिए दो शर्तें पूरी होना जरूरी है:
  • सदन की कुल सदस्य संख्या का बहुमत,
  • उपस्थित होकर मतदान करने वाले सदस्यों में कम से कम दो-तिहाई बहुमत
प्रस्ताव को संसद के दोनों सदनों में इसी विशेष बहुमत से पारित होना होता है और यह प्रक्रिया एक ही सत्र के दौरान पूरी होनी चाहिए।

5. राष्ट्रपति का आदेश
अगर प्रस्ताव संसद के दोनों सदनों से जरूरी विशेष बहुमत के साथ पारित हो जाता है, तो दोनों सदनों की ओर से राष्ट्रपति के सामने मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए औपचारिक संबोधन पेश किया जाता है। इसके बाद राष्ट्रपति मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने का आधिकारिक आदेश जारी करते हैं।

क्या इससे पहले किसी सीईसी को महाभियोग से हटाया गया है?

नहीं, भारत में अभी तक किसी भी सीईसी को इस प्रक्रिया के जरिए नहीं हटाया गया है। हालांकि, 12 मार्च को तृणमूल कांग्रेस के नेतृत्व में विपक्ष ने लोकसभा और राज्यसभा में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए प्रस्ताव दिए थे। लोकसभा वाले प्रस्ताव पर 130 सांसदों और राज्यसभा वाले प्रस्ताव पर 63 सांसदों ने हस्ताक्षर किए थे।

दोनों प्रस्तावों में निर्वाचन आयोग की ओर से चलाए जा रहे विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर का उल्लेख किया गया था। इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त पर 'पक्षपातपूर्ण और भेदभावपूर्ण आचरण' और 'चुनावी धोखाधड़ी और एसआईआर की जांच में बाधा डालने' के आरोप लगाए गए थे।

अप्रैल में राज्यसभा के सभापति और लोकसभा अध्यक्ष ने विपक्ष की ओर से दोनों सदनों में दिए गए इन प्रस्तावों को खारिज कर दिया था। विपक्षी नेताओं ने इस फैसले की आलोचना की थी।
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कैसे बदली प्रक्रिया? - फोटो : Amar Ujala

अब सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की मांग के बीच मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़े 2023 के कानून को लेकर भी सुप्रीम कोर्ट में मामला चल रहा है। 23 सितंबर यानी बुधवार को सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की पीठ ने इस कानून को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर सुनवाई की।

दोनों जजों की इस मामले में अलग-अलग राय थी। इसके बाद दोनों इस बात पर सहमत हुए कि मामले के दस्तावेज भारत के मुख्य न्यायाधीश के सामने रखे जाएं, ताकि उचित संख्या वाली संविधान पीठ के गठन पर विचार किया जा सके। उन्होंने अनूप बरनवाल मामले का भी जिक्र किया और कहा कि उसे अंतिम फैसले तक पहुंचने में लंबा समय लगा।

क्या है अनूप बरनवाल मामला?

अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामला 2023 में सुप्रीम कोर्ट के सामने आया था। उस समय मुख्य सवाल यह था कि निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति का तरीका क्या संविधान के अनुरूप था। याचिका में कहा गया था कि संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत संसद को निर्वाचन आयोग के सदस्यों की नियुक्ति के लिए कानून बनाना चाहिए। 2 मार्च 2023 को जस्टिस केएम जोसेफ की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने इस मामले में फैसला सुनाया।

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक संसद इस संबंध में कानून नहीं बनाती, तब तक मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति राष्ट्रपति एक समिति की सलाह पर करेंगे। उस समय नियुक्ति समिति में प्रधानमंत्री, लोकसभा में विपक्ष के नेता और भारत के मुख्य न्यायाधीश शामिल थे।

फिर 2023 में क्या बदला?

अनूप बरनवाल मामले के बाद संसद ने मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति से जुड़ा नया कानून बनाया। इसका नाम मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्त नियुक्ति, सेवा शर्त और कार्यकाल अधिनियम, 2023 है।

इस कानून में नियुक्ति के लिए नई तीन सदस्यीय चयन समिति का प्रावधान किया गया। इसमें प्रधानमंत्री अध्यक्ष, लोकसभा में विपक्ष के नेता सदस्य और प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री सदस्य होते हैं।

यानी 2023 के कानून के बाद नियुक्ति वाली समिति में भारत के मुख्य न्यायाधीश की जगह प्रधानमंत्री द्वारा नामित केंद्रीय कैबिनेट मंत्री को शामिल किया गया। इसी बदलाव को लेकर 2023 के कानून को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है।

2023 के कानून में और क्या प्रावधान हैं?

इस कानून में चुनाव आयुक्तों के कार्यकाल, योग्यता और सेवा शर्तों से जुड़े प्रावधान भी किए गए हैं। मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का कार्यकाल छह साल या 65 साल की उम्र तक, जो भी पहले हो, रहेगा। उन्हें दोबारा नियुक्त नहीं किया जा सकता। अगर कोई चुनाव आयुक्त बाद में मुख्य चुनाव आयुक्त बनता है तो उसका कुल कार्यकाल छह साल से ज्यादा नहीं हो सकता। कानून के तहत उम्मीदवार को चुनावों के प्रबंधन और संचालन का ज्ञान और अनुभव होना चाहिए। वह केंद्र सरकार के सचिव या उसके बराबर के पद पर रह चुका हो।

चुनाव आयुक्तों के नामों के लिए एक सर्च कमेटी का भी प्रावधान किया गया है। इसकी अध्यक्षता कैबिनेट सचिव करेंगे। यह समिति पांच नामों का पैनल तैयार करके चयन समिति के सामने रखेगी। हालांकि, चयन समिति इन पांच नामों तक सीमित नहीं है और दूसरे नामों पर भी विचार कर सकती है।

2023 के कानून में वेतन को लेकर भी बदलाव किया गया। पहले मुख्य चुनाव आयुक्त और अन्य चुनाव आयुक्तों का वेतन सुप्रीम कोर्ट के जज के बराबर था। नए कानून में इसे कैबिनेट सचिव के वेतन के बराबर किया गया है।

हालांकि, मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की संवैधानिक व्यवस्था में बदलाव नहीं किया गया है। उन्हें अभी भी सुप्रीम कोर्ट के जज की तरह और उन्हीं आधारों पर हटाया जा सकता है।
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