चीन ने भारतीय कारोबारियों और पेशेवरों के लिए बिजनेस वीजा के नियम सख्त कर दिए हैं। हाल के महीनों में वीजा आवेदन रद्द होने की दर 95% तक पहुंचने की बात सामने आई है। इसका असर इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और मैन्युफैक्चरिंग कंपनियों पर पड़ रहा है, जिन्हें चीन के बजाय थाईलैंड और सिंगापुर में बैठकें करनी पड़ रही हैं।
चीन ने भारतीय अधिकारियों के लिए व्यापार वीजा के नियम सख्त कर दिए हैं। चीन जाने वाले भारतीय कारोबारियों और पेशेवरों के लिए बिजनेस वीजा हासिल करना मुश्किल होता जा रहा है। इससे कंपनियों की बैठकें प्रभावित हो रही हैं और उन्हें थाईलैंड, सिंगापुर जैसे अन्य देशों में स्थानांतरित करना पड़ रहा है।
हाल के महीनों में चीनी व्यापार वीजा आवदेन रद्द करने की दर 95% तक बढ़ गई है। पुनः आवेदन भी स्वीकार नहीं किए जा रहे हैं। चीनी कंपनियों में काम करने वाले भारतीयों को भी आसानी से वीजा नहीं दिया जा रहा है। केवल 20 से 40 फीसदी आवेदन ही स्वीकृत हो रहे हैं। कंपनियों का कहना है कि आवेदन प्रक्रिया सख्त हो गई है। दोबारा आवेदन करने पर भी मंजूरी की कोई गारंटी नहीं है।
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विनिर्माण क्षेत्र पर सबसे अधिक असर
भारतीय इलेक्ट्रॉनिक्स, ऑटोमोबाइल और कॉन्ट्रैक्ट मैन्युफैक्चरिंग कंपनियां चीन से भारी मात्रा में मशीनरी, उपकरण और पुर्जों का आयात करती हैं। उद्योग जगत के अनुसार, कुछ क्षेत्रों में पूंजीगत सामान और पुर्जों की 50 फीसदी तक निर्भरता चीन पर बनी हुई है। तकनीकी समस्याओं के समाधान, आपूर्ति शृंखला प्रबंधन और व्यापारिक वार्ताओं के लिए चीन की यात्रा जरूरी हो जाती है। वीजा मंजूरी में देरी से इन गतिविधियों पर सीधा असर पड़ रहा है।
क्या है चीन का बिजनेस वीजा?
चीन के बिजनेस वीजा को एम वीजा कहा जाता है। यह बिजनेस मीटिंग, प्रशिक्षण कार्यक्रम और अन्य व्यापारिक गतिविधियों के लिए दिया जाता है। यह उन लोगों के लिए उपयुक्त माना जाता है, जो किसी स्थानीय चीनी कंपनी के कर्मचारी नहीं होते, लेकिन वे छह महीने से कम अवधि के लिए चीन की व्यावसायिक यात्रा पर जाते हैं।