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कुल्लू दशहरा: माता भुवनेश्वरी दुराह को सुलाने के बाद नृत्य करते हैं पुजारी, सदियों पुरानी परंपरा आज भी कायम

Tue, 27 Oct 2026 03:24 PM IST
Ankesh Dogra गौरीशंकर, कुल्लू।

सार

कुल्लू दशहरा में माता भुवनेश्वरी दुराह के शिविर में सदियों पुरानी परंपरा निभाई जा रही है। शाम की पूजा के बाद माता को सुलाकर पुजारी पारंपरिक वाद्ययंत्रों की धुन पर 20 से 30 मिनट तक नृत्य करते हैं। इस दौरान लुप्त होते वाद्ययंत्रों की धुन श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

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कुल्लू दशहरा की अनोखी परंपरा। - फोटो : अमर उजाला नेटवर्क
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विस्तार
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अंतरराष्ट्रीय कुल्लू दशहरा उत्सव में करीब 200 किलोमीटर दूर से ढालपुर पहुंची माता भुवनेश्वरी दुराह के अस्थायी शिविर में एक अनूठी परंपरा देखने को मिल रही है। यहां शाम की पूजा के बाद माता को सुलाया जाता है और इसके बाद पुजारी पारंपरिक वाद्ययंत्रों की थाप पर नृत्य करते हैं। हर दिन शाम के समय होने वाला यह आयोजन श्रद्धालुओं के आकर्षण का केंद्र बना हुआ है।

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इस परंपरा की खास बात यह है कि नृत्य के दौरान ऐसे पारंपरिक वाद्ययंत्र बजाए जाते हैं, जो अब बहुत कम देखने और सुनने को मिलते हैं। इनकी धुन पर पुजारी ब्रह्मा, विष्णु और महेश की स्तुति के गीत गाते हुए नृत्य करते हैं। इस अनूठी परंपरा को देखने के लिए माता के शिविर में श्रद्धालुओं की भीड़ जुट रही है।

35 वर्षों से परंपरा निभा रहे पुजारी
माता के पुजारी केश्व राम ने बताया कि यह सदियों पुरानी परंपरा है। वह पिछले 35 वर्षों से माता की पूजा कर रहे हैं और पूजा के बाद नृत्य की इस रिवायत को निभा रहे हैं। उन्होंने बताया कि शाम होते ही पहले माता की पूजा की जाती है। इसके बाद पर्दा पड़ता है और माता को सुलाया जाता है। यह परंपरा पूरी होने के बाद पुजारी वहां पहुंचते हैं, जहां बजंतरी वाद्ययंत्र बजा रहे होते हैं। इसके बाद ब्रह्मा, विष्णु और महेश की स्तुति के गीतों पर नृत्य किया जाता है।

लुप्त होते वाद्ययंत्रों की धुन पर होती है पूजा और नृत्य
श्याम दास ने बताया कि पूजा से लेकर नृत्य तक की पूरी प्रक्रिया पारंपरिक वाद्ययंत्रों की ध्वनि के साथ संपन्न होती है। माता के पास धौंस, भाणा, धौकली (गुज्जू), छावा और धौकली (मुरली) जैसे पुराने वाद्ययंत्र मौजूद हैं। इनके साथ ढोल और नगाड़े का भी उपयोग किया जाता है। उन्होंने बताया कि इनमें से अधिकतर वाद्ययंत्र अब लुप्तप्राय हो गए हैं। दशहरा उत्सव में शामिल होने वाले अन्य देवी-देवताओं के पास भी इस तरह के वाद्ययंत्र बहुत कम देखने को मिलते हैं। ऐसे में माता भुवनेश्वरी दुराह के शिविर में निभाई जा रही यह परंपरा उत्सव में आने वाले लोगों के लिए खास आकर्षण बनी हुई है।

चार दिन पैदल चलकर पहुंचते हैं हारियान
माता के हारियान निरमंड उपमंडल के दुराह क्षेत्र से करीब 200 किलोमीटर की दूरी पैदल तय कर कुल्लू दशहरा पहुंचते हैं। इस यात्रा को पूरा करने में उन्हें लगभग चार दिन लगते हैं। दशहरा उत्सव के बाद वापस लौटने में भी करीब चार दिन का समय लगता है।
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20 से 30 मिनट तक चलता है नृत्य
माता के कारकूनों के अनुसार, अस्थायी शिविर में होने वाला यह नृत्य करीब 20 से 30 मिनट तक चलता है। माता के जहां-जहां मेले और उत्सव आयोजित होते हैं, वहां इस परंपरा का निर्वहन किया जाता है। केश्व राम, श्याम दास और सोहन लाल ने बताया कि माता के साथ यह परंपरा सदियों से निभाई जा रही है। उन्होंने कहा कि पूर्वजों से मिली इस रिवायत को जीवित रखने का प्रयास किया जा रहा है और आने वाली पीढ़ियों में भी इसे जारी रखने की कोशिश की जाएगी।
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