उच्च न्यायालय ने माना कि फैमिली कोर्ट की ओर से न्यूनतम मजदूरी अधिसूचना के आधार पर पति की मासिक आय 11,250 रुपये आंकी गई थी, इसके एवज में 4,000 प्रतिमाह का भरण-पोषण पूरी तरह से तर्कसंगत और न्यायसंगत है। अदालत ने पति को निर्देश दिया कि वह आदेश जारी होने के चार सप्ताह के भीतर बकाया भरण-पोषण राशि का भुगतान करे। यह मामला हमीरपुर का है। अपीलकर्ता सुरजीत और सावित्री देवी का विवाह 21 दिसंबर 1997 को हुआ था। विवाह के बाद दोनों के तीन बच्चे हुए। पत्नी का आरोप था कि उसके पति ने उसके साथ दुर्व्यवहार, मारपीट और शारीरिक व मानसिक उत्पीड़न करना शुरू कर दिया, जिससे तंग आकर और क्रूरता के आधार पर उसने वर्ष 2019 में तलाक की याचिका दायर की।
22 नवंबर 2021 को पारिवारिक अदालत ने तलाक की मंजूरी दे दी। इसके साथ ही पत्नी ने धारा 125 सीआरपीसी के तहत भरण-पोषण के लिए भी याचिका दायर की थी। हमीरपुर के फैमिली कोर्ट ने 23 जनवरी 2024 को फैसला सुनाते हुए पति को 18 मई 2019 से 4,000 प्रति माह भरण-पोषण देने का आदेश दिया था। पति ने इस फैसले इस को हाईकोर्ट में चुनौती दी। पति ने दलील दी कि वह एक दिहाड़ी मजदूर है और उम्र व खराब स्वास्थ्य के कारण कमाने में असमर्थ है। अदालत ने रिकॉर्ड पर मौजूद दस्तावेजों का अवलोकन करते हुए पाया कि पति ने 93,000 रुपये का बिजनेस लोन लिया था। पीठ ने टिप्पणी की कि एक आम दिहाड़ी मजदूर को बिजनेस लोन नहीं मिलता,जो पत्नी के इस दावे का समर्थन करता है कि पति ठेकेदारी का काम करता है। इसके अलावा, स्वस्थ और सक्षम व्यक्ति शारीरिक अक्षमता का पुख्ता प्रमाण दिए बिना भरण-पोषण से नहीं बच सकता।पति का दावा है कि पत्नी सिलाई का काम करती है और अपनी आजीविका चला सकती है। पत्नी अपनी मर्जी से अलग हुई थी और अब दोनों का तलाक हो चुका है। तलाक के बाद भरण-पोषण का अधिकार नहीं है।