हिसार। मां ममत्व का प्रतीक होती है लेकिन विकट हालात में मां से मजबूत कोई नहीं होता। राजस्थान के नोहर क्षेत्र के गांव परलीका की बेटी और सिरसा के गांव लुदेसर की बहू ममता ने इस कथन को सार्थक किया है। 2010 में लुदेसर गांव में बहू बनकर आई 14 वर्षीय ममता 20 साल की उम्र में विधवा हो गईं। पति राजकुमार सड़क दुर्घटना में चल बसे।
दुखों का पहाड़ टूटने के बावजूद ममता ने हार नहीं मानी और दो बच्चों (बेटा-बेटी) की बेहतर परवरिश करने की ठानी। बच्चे अभी पढ़ाई कर रहे हैं। पति के देहांत के बाद हाथ से कढ़ाई-बुनाई का काम सीखकर काम शुरू किया। साथ ही फिर से पढ़ाई शुरू की। इसके साथ ही सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रही हैं। आज ममता आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं।
पति के बाद जेठ और सास का भी हो गया निधन : ममता ने बताया वह और उनकी बड़ी बहन मीना बहू बनकर एक ही घर में आई थीं। पति की मौत के बाद जीवन यापन के लिए रोजगार शुरू करने से जिंदगी की गाड़ी पटरी पर आने ही लगी थी कि 2022 में बहन मीना के पति देवीलाल का दिल का दौरा पड़ने से देहांत हो गया। ससुर का निधन बहुत पहले हो चुका था। अब घर में कोई व्यस्क पुरुष नहीं बचा। घर की पूरी जिम्मेदारी मेरे और बहन मीना के कंधों पर आ गई। मैंने फिर से नई शुरुआत की। कुछ संभल पाती, इससे पहले जिंदगी ने एक और झटका दे दिया। सास को कैंसर हो गया। 2024 में सास की भी मौत हो गई लेकिन ममता ने जीवन को एक बार फिर नई दिशा देने का संकल्प किया। संवाद