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विचार: उच्च न्यायालय का निर्णय और ग्राम्य विकास पर फैलाया जा रहा भ्रम

Wed, 01 Jul 2026 06:49 PM IST
कीर्तिवर्धन मिश्र सुरेश बहादुर सिंह
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एक बड़ा प्रश्न हम सबके समक्ष है कि लोकतंत्र की सबसे बड़ी शक्ति क्या है? जवाब बहुत सारे हो सकते है, जैसे कि जनादेश सबसे बड़ी शक्ति है, लेकिन बात पूरे लोकतंत्र की हो रही है। जनादेश यह तय करता है कि सत्ता किसकी होगी, लेकिन जब लोकतंत्र के बारे में विचार करेंगे तो उसकी असली ताकत संविधान द्वारा निर्धारित संस्थाओं के बीच संतुलन और परस्पर सम्मान के रूप में उभरकर सामने आएगी। शासन जनता के विश्वास से चलता है, किंतु उसकी वैधता संविधान से आती है। इसलिए जब न्यायपालिका किसी प्रशासनिक निर्णय की संवैधानिक समीक्षा करती है, तो वह किसी सरकार की पराजय या विपक्ष की विजय का अवसर नहीं, बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था की स्वाभाविक प्रक्रिया है।  
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इलाहाबाद उच्च न्यायालय का हालिया निर्णय, जिसमें ग्राम प्रधानों को प्रशासक बनाए जाने की व्यवस्था को असंवैधानिक ठहराया गया है, इसी समीक्षा की एक स्वाभाविक परिणति है। लेकिन यहां सहमति और असहमति के विकल्प भी हैं। संविधान में असहमति के बिंदु पर आगे जाने की व्यवस्था भी है। तो मुझे ऐसा लगता है कि चूंकि सरकार ने ग्रामीण विकास कार्यों को केंद्र में रखते हुए यह फैसला लिया था तो वह अपने संविधान सम्मत विकल्प भी देखेगी। राज्य सरकार ने एक प्रयास किया था कि किसी भी अवरोध पर गांवों का विकास अवरुद्ध न होने पाए। जो विकास कार्य चल रहे हैं, वे रुकने न पाएं। इसमें सरकार का अपना पक्ष विकास का है। न्यायालय की गरिमा का सम्मान होना चाहिए, लेकिन जब बात विकास की हो, ग्रामीण जनता के विकास की हो तो विपक्ष का उसमें राजनीतिक स्वार्थ देखना कितना न्यायोचित है, इस पर विचार करना होगा। ऐसे मुद्दों पर संकीर्णता को त्याग कर सरकार का सहयोग देना भी विपक्ष का लोकतांत्रिक कर्तव्य है। 

यह समझना आवश्यक है कि वास्तविकता क्या है। पहला और सबसे बड़ा भ्रम यह फैलाया जा रहा है कि राज्य सरकार ने जानबूझकर असंवैधानिक कार्य किया, लेकिन क्या वाकई ऐसा है? नहीं, सरकार ने वही किया जो कोई भी जिम्मेदार व सजग संस्था करती। क्षेत्रीय विकास सुनिश्चित करने के लिए ग्राम प्रधान को ही प्रशासक बनाना सर्वाधिक उपयुक्त निर्णय था। फैसले की संवैधानिक व्याख्या एक जटिल और बहुआयामी प्रक्रिया है। सरकारें प्रशासनिक निर्णय लेती हैं, न्यायालय उनकी संवैधानिक समीक्षा करता है और यदि न्यायालय किसी व्यवस्था को संविधान के अनुरूप नहीं पाता तो सरकार उस आदेश को स्वीकार करते हुए आवश्यक कदम उठाती है या अपने पक्ष को उचित मानते हुए बड़ी बेंच या शीर्ष अदालत तक जाती है। यही संवैधानिक लोकतंत्र की सुंदरता है और यही उसकी ताकत भी। न्यायपालिका, विधायिका और कार्यपालिका के बीच यह संतुलन हमारे संविधान की आत्मा है। जब न्यायालय किसी व्यवस्था की संवैधानिक समीक्षा करता है तो इसका अर्थ यह है कि संवैधानिक व्याख्या का एक नया आयाम सामने आया है। आप सहमत हों तो स्वीकार करें या फिर इसे चुनौती दें।

कोर्ट के आदेश को केंद्र में रखते हुए एक भ्रम यह भी फैलाया जा रहा है कि ग्राम प्रधानों द्वारा किए गए अब तक के सभी कार्य और भुगतान अवैध हो गए हैं। इसे इतने जोर-शोर से फैलाया जा रहा है मानो पिछले पांच वर्षों में गांवों में हुआ हर निर्माण कार्य, हर सड़क, हर नाली, हर सामुदायिक भवन अब गैरकानूनी हो गया हो। यह न केवल कानूनी दृष्टि से निराधार है, बल्कि अत्यंत गैरजिम्मेदाराना भी है।  
 
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योगी सरकार में पंचायती राज संस्थाएं कितनी सशक्त हुई हैं, यह किसी को बताने की जरूरत नहीं। अदालत के आदेश पर कोई असंतुलित प्रतिक्रिया न देना न्यायपालिका के प्रति सरकार के सम्मान भाव का परिचायक है और वह इसके लिए प्रतिबद्ध भी प्रतीत होती है। हालांकि उत्तर प्रदेश सरकार के पास बड़ी बेंच या शीर्ष अदालत में अपील का अधिकार भी है। पंचायतों के विकास कार्य किसी भी स्थिति में प्रभावित नहीं होने दिए जाएं, यह उसकी प्रतिबद्थता भी है।

लोकतंत्र में न्यायालय की भूमिका संविधान के संरक्षक की है। जब वह किसी व्यवस्था की समीक्षा करता है और उसे परिमार्जित करने का निर्देश देता है, तो यह लोकतंत्र की जीवंतता का प्रमाण है। संवैधानिक संस्थाओं का सक्रिय रहना, सजग रहना, यह संदेश देता है कि वे अपने दायित्व निभा रही हैं। न्यायालय का सम्मान, संविधान की रक्षा और गांवों का निर्बाध विकास। इन तीनों को एक साथ चलना चाहिए और इसे सुनिश्चित करना सबकी जिम्मेदारी है। सुशासन न्यायपालिका का सम्मान करता है और जनता के हितों की सुरक्षा भी। इसलिए माना जा सकता है कि सरकार सुसंगत फैसले लेगी, संविधान सम्मत लेगी, जो विपक्ष के भ्रमजाल का जवाब भी होगा।

(अस्वीकरण: ये लेखक के निजी विचार हैं। लेखक सुरेश बहादुर सिंह इलाहाबाद हाईकोर्ट के पूर्व अपर शासकीय अधिवक्ता हैं।)
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