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‘छोटी फिल्मों को सहारा न मिला तो सिनेमा खत्म हो जाएगा', मनोज बाजपेयी ने ‘फैमिली मैन’ को भी बताया गेम चेंजर

सार

Manoj Bajpayee Exclusive Interview: मनोज बाजपेयी की वेब सीरीज ‘द फैमिली मैन’ ओटीटी की दुनिया में बड़ा बदलाव लाई है। हाल ही में अमर उजाला से खास बातचीत में मनोज ने अपने किरदार, ओटीटी के दौर, परिवार और इंडस्ट्री की चुनौतियों पर खुलकर बात की। 
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मनोज बाजपेयी - फोटो : इंस्टाग्राम@bajpayee.manoj
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विस्तार
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इन दिनों अभिनेता मनोज बाजपेयी सीरीज 'द फैमिली मैन 3' को लेकर चर्चा में हैं। इस सीरीज में वह श्रीकांत तिवारी नाम के स्पेशल एजेंट का रोल करते हैं। 'द फैमिली मैन' सीरीज ने वेब सीरीज की दुनिया में एक गेम चेंजर का काम किया है। हाल ही में अपनी इस सीरीज और फिल्मों को लेकर मनोज बाजपेयी ने अमर उजाला डिजिटल से लंबी बातचीत की। पढ़िए, बातचीत के प्रमुख अंश- 

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‘द फैमिली मैन 3’ का सफर कितना रोमांचक रहा?
सफर बेहद राेमांचक रहा। इस बार ‘द फैमिली मैन’ सिर्फ स्केल में बड़ा नहीं है, चुनौतियां भी कहीं ज्यादा बड़ी हैं। इस बार जो दुश्मन है वो भी बड़ा और खूंखार है। और अगर उसमें जयदीप अहलावत और निमरत कौर जैसे नाम जुड़े हों, तो समझ सकते हैं कि ये ऐसे ही नहीं आए हैं। श्रीकांत तिवारी इस बार बहुत कुछ लेकर आया है। 

पहली बार 'द फैमिली मैन' के बारे में सुना तो दिमाग में क्या चल रह था?
जब पहली बार इसके बारे में सुना तो मैं थोड़ा हिचकिचा रहा था। उस वक्त मैं वेब सीरीज करने के मूड में नहीं था। फिल्मों में बंदूकें उठाते उठाते मैं थोड़ा थक चुका था, कुछ नया करना चाहता था। तब कास्टिंग डायरेक्टर मुकेश छाबड़ा ने कहा कि राज और डीके (निर्देशक) से एक बार मिल लो। फिर मैं उनसे मिला। सिर्फ 20 मिनट कहानी सुनी और तय कर लिया कि इसे करूंगा। बतौर एक्टर मैं इसमें बहुत कुछ अलग कर सकता था।  

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सीरीज 'द फैमिली मैन' - फोटो : एक्स (ट्विटर)

क्या आप मानते हैं कि फैमिली मैन ने कहीं न कहीं गेमचेंजर का काम किया?
यकीनन, इसने पूरी मनोरंजन की दुनिया को उलट-पुलट करके रख दिया था। इसने ओटीटी को बहुत बड़ी पहचान दी और ऑडियंस को बताया कि थिएटर के अलावा भी एक मीडियम है जो आपका मनोरंजन कर सकता है। उसके बाद जब दूसरा सीजन आया.. वो तो बहुत ही बड़ा था। तब से मनोरंजन की पूरी परिभाषा ही बदल गई हमारे यहां पर।  

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मनोज बाजपेयी - फोटो : इंस्टाग्राम-@bajpayee.manoj

अगर आपको बॉलीवुड में एक बड़ा बदलाव लाने का मौका मिले, तो आप कौन-सा कदम उठाना चाहेंगे?
मैं तो केंद्र सरकार और सूचना एवं प्रसारण मंत्री से निवेदन करूंगा कि छोटी फिल्मों को तुरंत मदद और विशेष समर्थन दिया जाए। अगर ऐसा नहीं हुआ तो सिनेमा धीरे-धीरे खत्म होने लगेगा और प्रतिभाशाली निर्देशक खो जाएंगे। हर कोई मुख्यधारा या बड़ी फिल्म बना सके, यह जरूरी नहीं होता और हमेशा संभव भी नहीं होता। इसीलिए जरुरी है कि मध्यम और छोटे बजट वाली फिल्मों को सिनेमाघरों में एक सम्मानजनक रिलीज मिले। यह संघर्ष कई साल से जारी है लेकिन अभी तक इसका समाधान नहीं निकला।

क्या आपकी असल ज़िंदगी में कभी ऐसा वक्त आया जब काम से पहले परिवार को चुनना पड़ा हो?
परिवार और मेरा काम कभी एक-दूसरे के आड़े नहीं आते। इसका पूरा श्रेय मेरी पत्नी को जाता है। अगर वह कुछ चाहती हैं और मैं खाली होता हूं, तो मैं समय देने की पूरी कोशिश करता हूं। 

पूरा इंटरव्यू यहां देखें: 

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