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सेमीकंडक्टर इंजीनियरिंग: कैसे संग्रहित पानी को कीटाणु मुक्त बना रही तकनीक? एक छात्रा की पहल के बारे में जानिए

Wed, 02 Sep 2026 10:34 AM IST
शाहीन परवीन एजुकेशन डेस्क, अमर उजाला

सार

पानी को सुरक्षित और कीटाणु मुक्त बनाने के लिए एक छात्रा ने सेमीकंडक्टर आधारित तकनीक विकसित की है। यह तकनीक संग्रहित पानी में बैक्टीरिया की वृद्धि को रोकने में मदद करती है और लोगों को स्वच्छ पानी उपलब्ध करा रही है।

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सेमीकंडक्टर इंजीनियरिंग - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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दिल्ली की जल परियोजना अमृत ने जल प्रौद्योगिकी क्षेत्र में अपनी पहचान बनाई है। यह परियोजना रासायनिक मुक्त यूवी-सी एलईडी तकनीक का उपयोग करती है। इसके पीछे सेमीकंडक्टर इंजीनियरिंग का महत्वपूर्ण योगदान है। इस पहल की कॉम्पैक्ट सबमर्सिबल यूवी-सी एलईडी स्टेरिलाइजेशन यूनिट एक यूवी-सी लाइट-एमिटिंग डायोड पर आधारित है। यह एक ऑप्टोइलेक्ट्रॉनिक सेमीकंडक्टर उपकरण है जो बिना मर्करी लैंप या अतिरिक्त रसायनों के कीटाणुनाशक पराबैंगनी प्रकाश उत्पन्न करता है। इसे सीधे संग्रहित पानी में रखा जाता है, जिससे यह उपयोग के स्थान पर ही पानी को कीटाणुरहित करता है। यह उन समुदायों के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है जहां टैंकरों से अनियमित आपूर्ति के कारण पानी में दूषित पदार्थ मिल जाते हैं।

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इस तकनीक की खास बात यह है कि इसमें किसी रसायन को पानी में मिलाने की जरूरत नहीं पड़ती। साथ ही, बार-बार किसी सामग्री को बदलने या रासायनिक कचरे को संभालने की जरूरत भी नहीं होती। इससे इसका रखरखाव आसान हो जाता है। यह तकनीक खास तौर पर उन इलाकों के लिए उपयोगी है जहां टैंकर से पानी की आपूर्ति नियमित नहीं होती। ऐसे में पानी को संग्रहित करने के बाद इसी यूनिट की मदद से उसे वहीं कीटाणुरहित किया जा सकता है।

देविका की तकनीक को मिला गोल्ड क्रेस्ट अवार्ड

इस परियोजना की संस्थापक छात्रा देविका राज बत्रा हैं। उनकी इस तकनीक को इंजीनियरिंग क्षेत्र में मान्यता मिली है। यूनिट के पेटेंट के लिए आवेदन किया गया है। इसके काम और प्रदर्शन के लिए इसे ब्रिटिश साइंस एसोसिएशन का गोल्ड क्रेस्ट अवार्ड भी मिला है।

यह पुरस्कार सिर्फ इस तकनीक के विचार के आधार पर नहीं दिया गया, बल्कि माइक्रोबायोलॉजिकल टेस्ट और फील्ड डेटा के आधार पर मिला है। यानी अलग-अलग परीक्षणों और वास्तविक परिस्थितियों में इसके प्रदर्शन को जांचने के बाद इसे यह सम्मान दिया गया।

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सामुदायिक प्रभाव और स्वास्थ्य सुधार

कुसुमपुर पहाड़ी में यह प्रणाली अब 700 से ज्यादा घरों और 5,000 से ज्यादा लोगों तक पहुंच रही है। निगरानी के दौरान 300 से ज्यादा लोगों के स्वास्थ्य में सुधार दर्ज किया गया है। यह परियोजना लोगों को साफ और सुरक्षित पानी उपलब्ध कराने में मदद कर रही है।

देविका राज बत्रा की यह पहल दिखाती है कि छात्र विज्ञान और तकनीक का इस्तेमाल कर वास्तविक समस्याओं का समाधान कर सकते हैं। इस यूनिट की प्रभावशीलता वैज्ञानिक जांच और जमीन पर जुटाए गए आंकड़ों से भी साबित हुई है। पानी की गुणवत्ता बेहतर होने से स्थानीय लोगों के स्वास्थ्य पर भी सकारात्मक असर पड़ा है।

प्रारंभिक निवेश और विस्तार योजना

परियोजना ने एक प्रारंभिक वाणिज्यिक परीक्षण भी सफलतापूर्वक पूरा किया है। इसे उद्यमी अमन गुप्ता से 7 लाख रुपये का एंजेल निवेश प्राप्त हुआ है। यह निवेश मॉडल की स्केलिंग क्षमता में विश्वास का संकेत देता है, बजाय इसके कि यह केवल एक शोध प्रोटोटाइप बना रहे। इस विस्तार को 70 अमृत एंबेसडर के एक प्रशिक्षित नेटवर्क के माध्यम से संभाला जा रहा है। ये एंबेसडर स्थापित इकाइयों का रखरखाव करते हैं। यह वितरण और सर्विसिंग परत कई हार्डवेयर उद्यमों के लिए बनाना मुश्किल होता है। बत्रा की टीम का अनुमान है कि अधिक यूनिटों के उत्पादन और स्थापना के साथ यह दृष्टिकोण 10,000 से अधिक निवासियों तक पहुंच सकता है।

जल प्रौद्योगिकी में एक नया मॉडल

जल प्रौद्योगिकी क्षेत्र में, जहां उपयोग के स्थान पर कीटाणुशोधन लंबे समय से उपभोज्य वस्तुओं या ग्रिड बिजली पर निर्भर रहा है, वहां यह सबमर्सिबल यूवी-सी एलईडी प्रणाली एक नया मॉडल प्रस्तुत करती है। इसे रुक-रुक कर आपूर्ति के लिए बनाया गया है और स्थानीय संचालकों द्वारा इसका रखरखाव किया जाता है। यह एक ऐसा मॉडल है जिस पर ध्यान देना चाहिए। यह किसी कॉर्पोरेट लैब में शुरू नहीं हुआ, बल्कि एक छात्रा की इस जिद से शुरू हुआ कि विज्ञान को फील्ड में खरा उतरना चाहिए। यह परियोजना कम लागत वाली, रासायनिक मुक्त, सेमीकंडक्टर-आधारित कीटाणुशोधन यूनिट है। इसमें स्वतंत्र वैज्ञानिक मान्यता, प्रारंभिक निवेश और स्थानीय संचालकों द्वारा बनाए रखा गया एक कार्यशील सामुदायिक परिनियोजन शामिल है।
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