जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू में शैक्षणिक सत्र 2026-27 के पीएचडी दाखिलों को लेकर विवाद सामने आया है। स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया (एसएफआई) ने आरोप लगाया है कि दाखिले के विवरण में अनुसूचित जाति (एससी) और अनुसूचित जनजाति (एसटी) के लिए तय आरक्षण नियमों के मुताबिक सीटें नहीं दिखाई गई हैं। संगठन ने दिव्यांग विद्यार्थियों के लिए आरक्षित सीटों पर भी सवाल उठाए हैं। एसएफआई ने विश्वविद्यालय से दाखिले का विवरण दोबारा ठीक करने की मांग की है। हालांकि, ये आंकड़े संगठन की ओर से लगाए गए आरोप हैं। इस मामले में विश्वविद्यालय का जवाब सामने आने पर स्थिति और स्पष्ट हो सकती है।
एसएफआई के मुताबिक, जेएनयू में पीएचडी दाखिले के लिए कुल 711 सीटें दिखाई गई हैं। इनमें एसटी वर्ग के लिए 38 सीटें रखी गई हैं, जो कुल सीटों का करीब 5.34 प्रतिशत है। संगठन का दावा है कि तय 7.5 प्रतिशत आरक्षण के हिसाब से एसटी वर्ग के लिए 15 सीटें कम हैं। इसी तरह, एससी वर्ग के लिए 103 सीटें दिखाई गई हैं। यह कुल सीटों का करीब 14.49 प्रतिशत है, जबकि निर्धारित आरक्षण 15 प्रतिशत है। एसएफआई ने इस आधार पर एससी वर्ग के लिए चार सीटों की कमी का दावा किया है।
आयोग ने जेएनयू से क्या जवाब मांगा है?
एसएफआई के अनुसार, राष्ट्रीय अनुसूचित जाति आयोग ने जेएनयू में आरक्षण से जुड़ी शिकायत पर संज्ञान लिया है। यह शिकायत एसएफआई की दिल्ली राज्य समिति की सदस्य और जेएनयू छात्रसंघ की उपाध्यक्ष गोपिका बाबू ने की थी। संगठन का कहना है कि 27 अक्टूबर 2026 को आयोग ने विश्वविद्यालय को याद दिलाया कि तय समय में रिपोर्ट नहीं दी गई है। आयोग ने अब सात दिन के भीतर जवाब देने को कहा है। एसएफआई ने यह भी बताया कि उसकी पहल के बाद राष्ट्रीय अनुसूचित जनजाति आयोग ने भी शिकायत दर्ज की है। इन आयोगों की आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी।
छात्रों का अनशन क्यों हुआ था?
यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब जेएनयू छात्रसंघ ने 20 अक्टूबर को अपना 17 दिन का भूख हड़ताल आंदोलन खत्म किया था। समाचार एजेंसी पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रों की कई मांगों पर सहमति जताई थी। इनमें पांच विद्यार्थियों का निष्कासन तत्काल वापस लेने और दूसरे प्रदर्शनकारियों के खिलाफ दर्ज प्राथमिकी वापस लेने का फैसला शामिल था। निष्कासन का सामना कर रहे विद्यार्थियों में अदिति मिश्रा, के. गोपिका बाबू, सुनील यादव, दानिश अली और नितीश कुमार शामिल थे। प्रशासन ने विरोध प्रदर्शनों के दौरान शुरू की गई कुछ अनुशासनात्मक जांच वापस लेने पर भी सहमति जताई थी।
एसएफआई की अब क्या मांगें हैं?
एसएफआई ने जेएनयू से पीएचडी दाखिले का विवरण संशोधित करने, आरक्षण का स्पष्ट रोस्टर सार्वजनिक करने और अलग-अलग वर्गों में दाखिले के आंकड़े जारी करने की मांग की है। संगठन ने लंबे समय से खाली आरक्षित पदों को भरने की भी मांग उठाई है। इसके अलावा, विश्वविद्यालय प्रशासन ने छात्रसंघ की भागीदारी वाली समिति बनाकर प्रवेश परीक्षा की समीक्षा करने और छात्रावासों में आरक्षण के मुद्दे पर विचार करने जैसे कदमों पर सहमति जताई थी। अब देखना होगा कि पीएचडी दाखिले में आरक्षण से जुड़े आरोपों पर विश्वविद्यालय क्या जवाब देता है और आयोग आगे क्या कदम उठाता है।