एनसीईआरटी की नौवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान किताब में बदली तस्वीर
जिस अध्याय को सर्वोच्च न्यायालय ने न्यायपालिका पर चलाई गई गोली बताकर देशभर से वापस मंगवा लिया था, वह अब नए रूप में स्कूलों तक पहुंच चुका है। नई शक्ल में उसमें अदालतों की कोई कमजोरी नहीं है। राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद यानी एनसीईआरटी की नौवीं कक्षा की सामाजिक विज्ञान की किताब एक्सप्लोरिंग सोसाइटी: इंडिया एंड बियॉन्ड के दूसरे भाग का संशोधित अध्याय द रोल ऑफ द ज्यूडिशियरी इन अवर सोसाइटी अब न्यायपालिका को सिर्फ ढांचे, अधिकार क्षेत्र और डिजिटल पहलों के चश्मे से दिखाता है। भ्रष्टाचार, मुकदमों का पहाड़ और जजों की कमी, जिन पर पिछला विवाद खड़ा हुआ था, नए पाठ से पूरी तरह बाहर हैं।
26 फरवरी को किताब देशभर से वापस मंगाई
फरवरी 2026 में आठवीं की इसी किताब के न्यायपालिका वाले अध्याय में न्यायपालिका में भ्रष्टाचार शीर्षक से एक हिस्सा सामने आया था। उसमें अदालतों के सामने की चुनौतियों में विभिन्न स्तरों पर भ्रष्टाचार और लंबित मामलों के भारी बोझ को गिनाया गया था। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की पीठ ने इसका स्वतः संज्ञान लिया।
- 26 फरवरी को अदालत ने किताब को तुरंत देशभर से वापस लेने का आदेश दिया। एनसीईआरटी को बिना शर्त माफी मांगनी पड़ी और पूरी किताब वापस लेनी पड़ी। केंद्र ने समीक्षा के लिए विशेषज्ञ समिति बनाई तब अध्याय बदला गया।
- नए पाठ में क्या है?: नया अध्याय मार्टिन लूथर किंग जूनियर के इस कथन से शुरू होता है कि कहीं भी अन्याय हर जगह के न्याय के लिए खतरा है। इसके बाद संविधान की प्रस्तावना में न्याय का वादा, अदालतों का पिरामिड, सर्वोच्च न्यायालय की 33 जमा एक की संख्या, जजों की योग्यता और सेवानिवृत्ति की उम्र समझाई गई है। अनुच्छेद 142 की पूर्ण न्याय वाली शक्ति का भी ब्योरा है। अध्याय बार बार दोहराता है कि न्यायपालिका विधायिका और कार्यपालिका से स्वतंत्र है।
सरकार का श्रेय, इतिहास की चूक
किताब में आजादी के बाद औपनिवेशिक दौर के सैकड़ों कानून भेदभावपूर्ण पाए गए और सरकार ने ऐसे 1500 से ज्यादा कानून रद्द किए। उदाहरण में 1871 का आपराधिक जनजाति कानून दिया गया है।
मुकदमों का बोझ, पर बिना आंकड़े
देश की अदालतों में करोड़ों मुकदमे लंबित हैं, पर नए अध्याय में इसका कोई आंकड़ा नहीं है। समस्या सिर्फ परोक्ष रूप से झलकती है। डिजिटल पहलों वाले हिस्से में ई फाइलिंग, हाइब्रिड सुनवाई, सीधा प्रसारण और राष्ट्रीय न्यायिक डाटा ग्रिड गिनाए गए हैं। सर्वोच्च न्यायालय के मुख्य द्वार पर लगी वर्चुअल जस्टिस क्लॉक को पारदर्शिता और जवाबदेही की मिसाल बताया गया है। अभ्यास प्रश्नों में बच्चों से कहा गया है कि वे खुद को विधायिका या कार्यपालिका का हिस्सा मानकर मुकदमों की बड़ी संख्या से निपटने के नए उपाय सुझाएं।
नियुक्ति में कॉलेजियम का जिक्र नहीं
जजों की नियुक्ति वाले हिस्से में किताब केवल संविधान का अक्षर दोहराती है। उसके मुताबिक सर्वोच्च न्यायालय के जज राष्ट्रपति नियुक्त करते हैं। उच्च न्यायालय के जज राष्ट्रपति, मुख्य न्यायाधीश, राज्यपाल और संबंधित उच्च न्यायालय के मुख्य न्यायाधीश से परामर्श के बाद नियुक्त होते हैं। कॉलेजियम प्रणाली कोई जिक्र नहीं है।