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जलवायु परिवर्तन से विलुप्त हो रहीं पारंपरिक फसलें : त्रिवेन्द्र

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- पूर्व सीएम ने कहा, उत्तराखंड समेत पूरे हिमालयी क्षेत्र की फसलें, हमारी संस्कृति और पोषण का मजबूत आधार
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अमर उजाला ब्यूरो
देहरादून। लोकसभा में हरिद्वार सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री त्रिवेन्द्र सिंह रावत ने जलवायु परिवर्तन, प्रवासन और वाणिज्यिक खेती के कारण पर्वतीय क्षेत्रों की पारंपरिक फसलों के तेजी से विलुप्त होने के विषय को उठाया।
उन्होंने केंद्र सरकार से इन फसलों के संरक्षण, पुनर्जीवन और बाजार से जोड़ने संबंधी राष्ट्रीय स्तर पर प्रभावी नीति एवं ठोस कदमों की जानकारी मांगी। रावत ने यह जानना चाहा कि क्या सरकार को पता है कि जलवायु परिवर्तन और प्रवासन के कारण कई पहाड़ी फसलें विलुप्ति के कगार पर हैं, आईसीएआर और नेशनल जीन बैंक ने ऐसी किस्मों के संरक्षण और पुनर्प्रचलन के लिए क्या कार्यवाही की है, क्या पोषक तत्वों से भरपूर विलुप्त प्राय: फसलों के संवर्धन के लिए कोई विशेष कार्यक्रम प्रस्तावित है, बीज बैंकों, प्रसंस्करण सुविधाओं और बाजार उपलब्धता के माध्यम से इन फसलों को दोबारा लोकप्रिय बनाने के लिए सरकार क्या कदम उठाएगी।
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इस पर कृषि एवं किसान कल्याण राज्य मंत्री रामनाथ ठाकुर ने अपने लिखित उत्तर के जवाब में यह अवगत कराया कि आईसीएआर और नेशनल जीन बैंक ने 1,00,086 विलुप्त या संकटग्रस्त किस्मों का संरक्षण, दस्तावेजीकरण और पुनर्प्रचलन किया है। इनमें 85,587 भू-प्रजातियां और 14,499 पारंपरिक कृषक किस्में शामिल हैं। सरकार पोषक तत्वों से भरपूर मिलेट, छद्म-अनाज और औषधीय पौधों के संरक्षण एवं प्रसार को सक्रिय रूप से बढ़ावा दे रही है। उन्होंने बताया कि अंतरराष्ट्रीय मिलेट वर्ष 2023 के जरिए इन फसलों के प्रति जागरूकता और अनुसंधान को विशेष गति मिली है। इससे पर्वतीय क्षेत्रों की जैविक उपज के लिए विशेष एफपीओ, मार्केट लिंकेज और मंडियों में समर्पित स्थान विकसित किए जा रहे हैं।
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