उत्तराखंड में जल विद्युत परियोजनाएं लगाने के लिए रास्ता साफ हो गया है। सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय ने 24 जल विद्युत परियोजनाओं को छोड़कर बाकी स्थानों पर परियोजनाएं शुरू करने की हरी झंडी दे दी है।
परियोजनाएं लगाने वाली कंपनियां अब मंत्रालय के अधीन क्षेत्रीय कार्यालय में प्रस्ताव दे सकती हैं। प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाओं के प्रस्तावों पर रोक होने के कारण कई कंपनियों के हिमाचल व अन्य प्रदेशों में शिफ्ट होने की संभावना बन रही थी।
भारतीय वन्य जीव संस्थान ने वर्ष 2013 में रिपोर्ट दी थी कि प्रदेश की 24 विद्युत परियोजनाएं इको सिस्टम बिगाड़ रही हैं। इससे वन्य जीवों को दिक्कत हो रही है। इस आधार पर प्रदेश में जल विद्युत परियोजनाएं लगाने पर रोक लगा दी थी। मामला सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन रहा है।
इस दौरान केंद्रीय वन एवं पर्यावरण मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय में तकरीबन आधा दर्जन जल विद्युत परियोजनाओं का प्रस्ताव वन भूमि हस्तांतरण के संबंध में दाखिल किए गए थे, लेकिन इन पर विचार नहीं किया गया।
क्षेत्रीय कार्यालय में प्रस्ताव लटके होने के कारण कई कंपनियों ने हिमाचल व दूसरे प्रदेश जाने का मन बना लिया था। केंद्रीय वन, पर्यावरण एवं जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के क्षेत्रीय कार्यालय प्रमुख एवं अपर प्रमुख वन संरक्षक अजय कुमार ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट ने 24 जल विद्युत परियोजनाओं को छोड़कर बाकी के संबंध में निर्देश दे दिए हैं।
अब परियोजनाओं को मंजूरी मिलेगी। उन्होंने बताया कि कंपनियां परियोजनाओं के अपने प्रोजेक्ट कार्यालय में दे सकती हैं। उन पर विचार किया जाएगा।
ये हो रहा था नुकसान
भारतीय वन्य जीव संस्थान ने अपने शोध रिपोर्ट में भागीरथी और अलकनंदा बेसिन में चल रहे 24 जल विद्युत परियोजनाओं के प्रोजेक्ट को वन्य जीव, जल चरों के लिए नुकसानदेह बताया था।
इसमें कहा गया था कि जठगंगा, जालंधरीगाड, सियानगाड, बालगंगा, ककरोगाड, खिरोंगगंगा, धौलीगंगा, ऋषि गंगा आदि स्थानों पर चल रहे प्रोजेक्ट से न सुधर पाने वाला नुकसान हो रहा है। इससे जीव-जंतु और वनस्पतियां (फ्लोरा एंड फॉना) बुरी तरह प्रभावित हो रहे हैं।