...लेकिन हस्ताक्षर करवाते ही बदल गईं शर्तें
भरोसे में आकर जितेंद्र कुमार ने अपने क्रेडिट कार्ड से 1.40 लाख रुपये का भुगतान कर दिया। भुगतान के तुरंत बाद उनसे एक छपे हुए एग्रीमेंट पर बिना पढ़ने का समय दिए बिना हस्ताक्षर करा लिए गए। जब उन्होंने घर जाकर उसे पढ़ा, तो पता चला कि मौखिक वादों और लिखित शर्तों में जमीन-आसमान का अंतर है।
एग्रीमेंट में हर साल 9,500 रुपये का एक्स्ट्रा मेंटेनेंस चार्ज अनिवार्य था और खाने पर छूट जैसी कोई बात नहीं थी।
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कंपनी की मनमानी पर आयोग की कड़ी फटकार
जब ग्राहक ने उसी रात पैसे वापस मांगे, तो कंपनी ने नो-रिफंड पॉलिसी का हवाला देकर इनकार कर दिया। मामला उपभोक्ता आयोग पहुंचा, जहां अध्यक्ष पुष्पेन्द्र खरे और सदस्य अल्का नेगी की पीठ ने पाया कि कंपनी ने भ्रामक जानकारी देकर हस्ताक्षर कराए थे। आयोग ने स्पष्ट किया कि ऐसी अनुचित शर्तें कानूनन वैध नहीं हैं जो ग्राहक के हितों के खिलाफ हों।
कंपनी को 45 दिनों के भीतर 1.40 लाख रुपये वापस करने और मुआवजा व मुकदमा खर्च देने का आदेश है। इस राशि पर मुकदमा दाखिल करने के समय (नवंबर 2023) से भुगतान की तिथि तक छह फीसदी वार्षिक ब्याज भी देना होगा।