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वीडियो गेम में चलते युद्ध का प्रवेश: मनोवैज्ञानिक युद्ध से कैसे बदल रहा राजनीतिक प्रचार?

सार

वीडियो गेम कोई समस्या नहीं है। चिंता तब होती है, जब सरकारें युद्ध, राजनीति और मनुष्यों के विस्थापन को वीडियो गेम की भाषा में प्रस्तुत करने लगती हैं। 
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भू-राजनीति में बढ़ता वर्चुअल दखल - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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वीडियो गेम की दुनिया में हार के बाद एक विकल्प हमेशा बचा रहता है-‘प्ले अगेन’। खिलाड़ी फिर से शुरुआत कर सकता है। लेकिन, हकीकत में ऐसा कोई बटन नहीं होता। युद्ध में डूबी नौका, सीमा से खदेड़ा गया परिवार या बारूदी सुरंग की चपेट में आए व्यक्ति के लिए कोई ‘रीस्टार्ट’ नहीं होता। चिंता तब पैदा होती है, जब सरकारें राजनीति, युद्ध और मनुष्यों के विस्थापन को वीडियो गेम की भाषा में प्रस्तुत करने लगती हैं। सितंबर की शुरुआत में लगभग एकसाथ सामने आई अमेरिका और ईरान की दो घटनाएं इसी बदलती दुनिया की ओर संकेत करती हैं।
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अमेरिका के व्हाइट हाउस ने अपनी नीतियों को लोकप्रिय बनाने के लिए रेट्रो शैली के ऑनलाइन गेमों का एक पिटारा पेश किया। इनमें ‘रियो रन’ में खिलाड़ी अमेरिका-मेक्सिको सीमा पर प्रवासियों जैसे दिखने वाले पात्रों को रोकता व ‘निर्वासित’ करता है। दूसरे गेम ‘बिल्ड द वॉल’ में टेट्रिस की तरह दीवार बनाकर सीमा को कथित घुसपैठ से बचाना है। लगभग इसी समय ईरान ने भी वीडियो गेम की सांस्कृतिक भाषा को भू-राजनीतिक हथियार बना दिया। सिएरा लियोन स्थित ईरानी दूतावास ने 35 सेकंड का एक एनिमेटेड वीडियो जारी किया, जिसमें रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण होर्मुज जलडमरूमध्य को लोकप्रिय कंप्यूटर गेम ‘माइंसवीपर’ की स्क्रीन में बदल दिया गया। संदेश था-‘हबीबी (अंकल सैम), ईरान आओ।’ इस वीडियो के सामने आने के दौरान ईरान के होर्मुज स्ट्रेट में बारूदी सुरंगें बिछाने, अमेरिकी सैन्य कार्रवाई और होर्मुज में सुरक्षित नौवहन को लेकर अमेरिका-ईरान तनाव फिर बढ़ रहा था।

इन दोनों घटनाओं को केवल इंटरनेट पर की गई हल्की-फुल्की टिप्पणी या डिजिटल प्रचार मानना भूल होगी। इनके भीतर 21वीं सदी के राजनीतिक संचार का नया व्याकरण छिपा है-सत्ता का गेमिफिकेशन। अब तक गेमिफिकेशन का इस्तेमाल शिक्षा, कारोबार, फिटनेस और मार्केटिंग में लोगों की भागीदारी बढ़ाने के लिए होता रहा है। पर, जब यही तकनीक राजनीति में प्रवेश करती है, तो उसका उद्देश्य केवल मनोरंजन नहीं रह जाता है। इसकी प्रक्रिया किसी जटिल राजनीतिक मुद्दे को ऐसी कथा में बदल सकती है, जिसमें एक तरफ ‘हम’, दूसरी तरफ ‘वे’; एक तरफ खिलाड़ी, दूसरी तरफ शत्रु; एक तरफ विजय, दूसरी तरफ पराजय का भाव रहता है।
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इन उदाहरणों को देखें, तो वीडियो गेम आधुनिक मनोवैज्ञानिक युद्ध के अत्यंत प्रभावी माध्यम बनते दिखाई देते हैं। मीडिया दार्शनिक मार्शल मैकलुहान की प्रसिद्ध अवधारणा थी कि माध्यम खुद-ब-खुद संदेश को बदल देता है। वीडियो गेम के दौर में इसे एक कदम आगे बढ़ाकर समझने की जरूरत है। अब माध्यम केवल संदेश नहीं बदलता, वह दर्शक की भूमिका भी बदल देता है। इसलिए, राजनीतिक गेमिंग की मनोवैज्ञानिक शक्ति कहीं अधिक हो सकती है। यह प्रवृत्ति खास तौर पर उस पीढ़ी के संदर्भ में महत्वपूर्ण है, जिसकी राजनीतिक सूचनाओं की खपत तेजी से छोटे वीडियो, मीम, रील और इंटरैक्टिव डिजिटल सामग्री की ओर बढ़ी है।

इसके साथ एक नैतिक संकट भी जन्म लेता है कि क्या हर चीज को खेल बनाया जा सकता है? बेशक, खेल वास्तविकता को सरल करता है, लेकिन लोकतंत्र और अंतरराष्ट्रीय राजनीति इतनी सरल नहीं। हालांकि, यह भी समझना होगा कि वीडियो गेम्स अपने आप में समस्या नहीं हैं। वे कला, शिक्षा और इतिहास को समझने के प्रभावशाली माध्यम भी हो सकते हैं। लेकिन, समस्या तब शुरू होती है, जब सरकारें उनकी आकर्षक और सहभागी प्रकृति का इस्तेमाल जटिल मानवीय मुद्दों को एकतरफा राजनीतिक कथानक में बदलने के लिए करती हैं। अमेरिका और ईरान के ये प्रयोग भविष्य की ही एक झलक हैं। आने वाले समय में चुनाव प्रचार, सैन्य भर्ती, कूटनीतिक संघर्ष, राष्ट्रवाद और वैचारिक प्रचार में इंटरैक्टिव गेम, एआई अवतार और वर्चुअल दुनिया का इस्तेमाल बढ़ सकता है। संभव है कि भविष्य का राजनीतिक प्रचार हमें केवल यह न बताए कि किसे मित्र और शत्रु मानना है; वह हमें स्वयं उस शत्रु के विरुद्ध डिजिटल कार्रवाई करने को कहे। तब सबसे जरूरी कौशल केवल मीडिया साक्षरता नहीं, बल्कि गेम साक्षरता और एल्गोरिदमिक साक्षरता भी होगी।

नागरिकों को समझना होगा कि खेल के नियम किसने बनाए, जीत की परिभाषा किसने तय की, किस पात्र को नायक और किसे खतरा बनाया गया तथा कौन-सी वास्तविकता जानबूझकर स्क्रीन से बाहर छोड़ दी गई है। माइंसवीपर में खिलाड़ी का उद्देश्य छिपी हुई माइंस पहचानना होता है। आज के डिजिटल नागरिक के सामने भी यही चुनौती है कि वह राजनीतिक मनोरंजन की चमकदार स्क्रीन के नीचे छिपे प्रचार, पूर्वाग्रह और मनोवैज्ञानिक प्रभावों की ‘माइंस’ को पहचाने। वीडियो गेम में नई बाजी शुरू की जा सकती है, पर वास्तविकता में ऐसा नहीं होता। 
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