फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

रंग लाई मुहिम: अंधियारी रातों में फिर जगमगाने लगे जुगनू, क्या इंडोनेशिया बचा पाएगा यह नाजुक प्रजाति?

Sat, 15 Aug 2026 11:06 AM IST
हिमांशु सिंह चंदेल मुुकिता सुहार्तोनो, द न्यूयॉर्क टाइम्स

सार

इंडोनेशिया के बाली में एक संरक्षण केंद्र जुगनुओं को विलुप्त होने से बचाने की कोशिश कर रहा है और इसका असर अब दिखाई देने लगा है। कभी हजारों जुगनुओं से जगमगाने वाला तारो गांव फिर उनकी रोशनी से चमकने लगा है। लेकिन विकास, प्रदूषण और रसायनों ने इनके अस्तित्व पर संकट खड़ा कर दिया है। तो क्या वैज्ञानिकों की यह मुहिम आने वाली पीढ़ियों के लिए जुगनुओं की चमक बचा पाएगी? आइए, विस्तार से समझते हैं...
Register For Event
विज्ञापन
जुगनुओं को बचाने के लिए संरक्षण केंद्र में क्या किया जा रहा - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

बाली के तारो गांव में रात का अंधेरा अब फिर जुगनुओं की छोटी-छोटी रोशनियों से चमकने लगा है। कभी यह नजारा गांव की पहचान हुआ करता था, लेकिन विकास की तेज दौड़, प्लास्टिक कचरे और खेतों में बढ़ते रसायनों ने जुगनुओं के लिए मुश्किल खड़ी कर दी। आने वाली पीढ़ियां इस प्राकृतिक नजारे से वंचित न रहें, इसके लिए इंडोनेशिया के पहले और एकमात्र जुगनू संरक्षण केंद्र में इनकी संख्या बढ़ाने की कोशिश की जा रही है।

जुगनुओं को बचाने के लिए संरक्षण केंद्र में क्या किया जा रहा है?

तारो गांव में बनाए गए फायरफ्लाई कंजर्वेशन हाउस में जीव विज्ञानी जुगनुओं की आबादी बढ़ाने के लिए आधुनिक तकनीक का इस्तेमाल कर रहे हैं। इसके लिए विशेष उपकरण तैयार किए गए हैं, जिन्हें ‘हनीमून सूट’ कहा जाता है। लैब में पली-बढ़ी मादा जुगनुओं का जंगल से लाए गए नर जुगनुओं के साथ मिलन कराया जाता है। इसके बाद मादा जुगनुओं के अंडे इकट्ठा करके उन्हें इनक्यूबेटर में सुरक्षित रखा जाता है। इस पूरी प्रक्रिया का मकसद जुगनुओं की नई पीढ़ी तैयार करना है।

बचपन की याद ने संरक्षण की मुहिम शुरू करने की प्रेरणा कैसे दी?

इस मुहिम के पीछे वायन वर्दिका की बचपन की यादें हैं। करीब एक दशक पहले जब वह क्रूज जहाजों की नौकरी छोड़कर अपने पैतृक गांव तारो लौटे, तो वहां का बदला हुआ माहौल देखकर परेशान हो गए। नदियां प्लास्टिक कचरे से भरी थीं और धान के खेतों में बड़ी मात्रा में रसायनों का इस्तेमाल हो रहा था। उन्हें अपना बचपन याद आया, जब गांव हजारों जुगनुओं की चमक से रोशन रहता था। उन्होंने जुगनुओं को बचाने का फैसला किया और अपने घर के एक हिस्से को ही संरक्षण केंद्र बना दिया।

क्या विकास और प्रदूषण ने जुगनुओं के अस्तित्व को खतरे में डाल दिया?

तारो गांव में जुगनुओं की संख्या कम होने के पीछे बदलता पर्यावरण बड़ी वजह माना गया है। जुगनू बेहद नाजुक जीव होते हैं और साफ वातावरण में ही पनप सकते हैं। प्लास्टिक प्रदूषण, खेती में इस्तेमाल होने वाले रसायन और विकास की तेज रफ्तार ने उनके प्राकृतिक वातावरण को प्रभावित किया। वर्दिका की कोशिश इसी बदले हुए वातावरण में जुगनुओं के लिए सुरक्षित जगह तैयार करने की है। 2018 में शुरू हुआ फायरफ्लाई कंजर्वेशन हाउस अब इस मुहिम का केंद्र बन चुका है।

दुनिया की कितनी जुगनू प्रजातियां विलुप्ति के खतरे में हैं?

दुनियाभर में जुगनुओं की करीब 10 प्रतिशत प्रजातियां विलुप्त होने के खतरे में बताई गई हैं। इन छोटे जीवों को पर्यावरण की सेहत का एक तरह का संकेतक भी माना जाता है। अगर किसी इलाके में जुगनू मौजूद हैं, तो यह उस जगह के पर्यावरण के अपेक्षाकृत साफ होने का संकेत हो सकता है। यही वजह है कि जुगनुओं को बचाने की कोशिश केवल एक जीव को बचाने तक सीमित नहीं है, बल्कि यह प्राकृतिक पर्यावरण को सुरक्षित रखने से भी जुड़ी है।

क्या जुगनुओं की यह चमक आने वाली पीढ़ियों के लिए बच पाएगी?

जुगनुओं का जीवन चक्र भी काफी संवेदनशील है। एक जुगनू को पूर्ण वयस्क बनने में छह महीने से दो साल तक लग सकते हैं, जबकि वयस्क जुगनू की उम्र केवल करीब 22 दिन बताई गई है। ऐसे में उनकी आबादी बढ़ाना आसान काम नहीं है। बाली का संरक्षण केंद्र इसी चुनौती से जूझते हुए नई पीढ़ी तैयार कर रहा है। अगर साफ पर्यावरण और संरक्षण की कोशिशें साथ-साथ चलती रहीं, तो आने वाली पीढ़ियां भी तारो की अंधियारी रातों में जुगनुओं की वही चमक देख सकती हैं।
विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें