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मुद्दा: प्रकृति संवाद का पर्यावरण, अहंकार के समय में मनुष्य में आत्मसंयम की गुंजाइश बची है?

संदीप जोशी Published by: Pavan Updated Tue, 26 May 2026 07:02 AM IST

सार

एक तरफ जहां बाजार हमारी इच्छाओं को हवा देता है, तो दूसरी तरफ सत्ता की अपनी प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में प्रकृति संवाद जरूरी है। गोविंदाचार्य ने कभी कहा था कि राजनीति सबसे उत्तम संभावना तलाशने की कला है। कार्यकर्ता के तौर पर समाज से जुड़ने के लिए उनको सोशल इंजीनियरिंग करने वाला माना गया। उनके लिए राजनीति प्रोफेशन के बजाय मिशन रही।
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प्रकृति संवाद का पर्यावरण - फोटो : अमर उजाला ग्राफिक्स

दिल्ली में सत्ता के केंद्र के भी केंद्र - कॉन्स्टिट्यूशन क्लब के खचाखच भरे सभागार में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुरोधा विचारक केएन गोविंदाचार्य का बयासीवां जन्मदिन, 'प्रकृति संवाद' के रूप में मना। सभी जानते हैं, गोविंदाचार्य ने राजनीति के शिखर पर रहते हुए ही अचानक शिक्षण अवकाश ले लिया था। उसके बाद से ही सामाजिक बदलाव और नैसर्गिक जीवन का बोध कराने में लगे हैं, क्योंकि आदर्श से जीवन को देखने, जीने वाले सदा आशावादी ही रहते हैं। अब जागरूक करना, समाज में सेवाभाव जगाते रहना ही उनका उद्देश्य है। उनके लिए ज्यादा जरूरी रहा, सर्वोदय सेवा की जरूरत के लिए समर्पण। उनके ही अनुसार, वे सत्ता, संपत्ति या सम्मान के लिए राजनीति में नहीं आए थे। उपनिवेशीकरण की मानसिक गुलामी से समाज को स्वतंत्र बनाने का मन था।


गोविंदाचार्य ने कभी कहा था कि राजनीति सबसे उत्तम संभावना तलाशने की कला है। कार्यकर्ता के तौर पर समाज से जुड़ने के लिए उनको सोशल इंजीनियरिंग करने वाला माना गया। उनके लिए राजनीति प्रोफेशन के बजाय मिशन रही। इसलिए राजनीति से हटने, या हटाए जाने के बाद वे समाज सत्ता की जागरूकता में लगे। आज भी वे मानव केंद्रित विकास की जगह प्रकृति केंद्रित विकास की जरूरत पर ही जोर देने में लगे हैं। विकास के नाम पर प्रकृति पर हो रहे अपमान, शोषण व अत्याचार को समाज के सामने रखने व समझाने में लगे हैं। उनका कहना कि आज जो पहाड़ धंस रहे हैं, नदियां सूख रही हैं, जंगल कटते जा रहे हैं, उसका असर जीवन-मृत्यु के बीच की खुशहाली पर पड़ रहा है।


वैश्वीकरण में रमी अंधाधुंध विकास की लत, धन व पद का विकार पैदा करती है और फिर समाज के लिए विनाश लाती है। इसलिए गोविंदाचार्य के जन्मदिन पर प्रकृति संवाद कराया गया, ताकि विकास, विकार व विनाश परियोजनाओं के क्रम से अलग, प्रकृति के प्रति समाज में संवाद चले। समाज में अति-विकास की इच्छा को लेकर संयम के जीवन की समझ बने। समाज में सत्ता पर निगरानी के अधिकार की समझ पनपे। समाज समन्वय से सत्ता पर अंकुश रखा जाए। और समाज में प्रकृति को सहेजने का सौहार्द जगे। समाज में बायोडायवर्सिटी या जैव-विविधता के साथ जीने की इच्छा पुन: जन्मे। जल, जंगल, जमीन व जानवर के अनुकूल जन के जीने की जीवन व्यवस्था बने।


गोविंदाचार्य का मानना रहा है कि तकनीक वही उपयोगी रहेगी, जो इकनॉमी (अर्थ), इकोलॉजी (पारिस्थितिकी या पर्यावरण) और एथिक्स (नैतिक) का समन्वय रखेगी। केवल उत्पादन बढ़ाने पर ध्यान देंगे, और उपभोग कम नहीं करेंगे, तो जैसा गांधीजी ने कहा था, ‘प्रकृति में सभी की जरूरत के लिए पर्याप्त है, लेकिन एक की भी लालसा के लिए कम ही रहेगा।’  


जैव-विविधता में ही मनुष्य का भी जीवन है। कोविड समय में डेविड एटनबरो की फिल्म अ लाइफ ऑन अवर प्लानेट आई थी। चेर्नोबिल, यूक्रेन के परमाणु पावर स्टेशन में विस्फोट से शुरू हुई फिल्म आखिर में वहां की इमारतों के पीछे जाकर खत्म होती है। चालीस साल से चेर्नोबिल रहने लायक नहीं रहा है। उस इलाके में अब जंगल अपने पूरे जंगलीपन में उभर आया है। धरती की सेहत सुधारने वाला मूल अंग जंगल हैं। इसलिए विज्ञान के सहारे किया गया अंधाधुंध विकास भी अंत: जंगलीपन के विकास में समा जाएगा।  


इन सब से बहुत पहले, यानी सन 1969 में राजेन्द्र माथुर ने ‘सभ्यता का कचरा’ नाम से लेख लिखा था। उसमें उन्होंने कहा था, 'जब गरीबी-अमीरी की लड़ाई खत्म हो जाएगी, तब यही लड़ाई बचेगी। कार्ल मार्क्स और पूंजीवाद की जगह निसर्ग और विज्ञान के द्वंद्व की राजनीति शुरू होगी।' आज भी हम न तो अमीरी या गरीबी घटा पाए और न ही निसर्ग से विज्ञान का समन्वय बैठा पाए। एक तरफ जहां बाजार हमारी इच्छाओं को हवा देता है, तो दूसरी तरफ सत्ता की अपनी प्राथमिकताएं हैं। ऐसे में प्रकृति संवाद जरूरी है।
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