फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स

भावनाएं फॉरवर्ड नहीं होतीं: अब एक ही कमरे में है बाजार भी, घर भी! क्यों न कुछ कदम चलकर बातचीत कर ली जाए...

नन्दितेश निलय (स्पीकर, लेखक एवं एथिक्स प्रशिक्षक) Published by: न्यूज डेस्क Updated Mon, 31 Aug 2026 08:26 AM IST

सार

घर हो या ऑफिस, हम सबकुछ टेक्स्ट मैसेज या ई-मेल से कहना चाहते हैं। और नहीं तो चुपचाप फॉरवर्ड। क्यों न टेक्स्ट और ई-मेल के साथ कभी फोन उठाकर या कुछ कदम चलकर बातचीत कर ली जाए और उस टॉल्सटॉय, उस कीट्स को याद किया जाए, जहां संप्रेषण के माध्यम पत्र भी हुआ करते थे।
Register For Event
विज्ञापन
विज्ञापन
क्या हमारी अभिव्यक्ति बहुत ही नीरस होती जा रही है? - फोटो : एआई जनरेटेड


घर हो या ऑफिस, हम सबकुछ टेक्स्ट मैसेज या ई-मेल से कहना चाहते हैं। और नहीं तो चुपचाप फॉरवर्ड।  वह व्यक्ति, वह रिश्ता या वह सहकर्मी, हमें आसपास दिखता जरूर है, या हम उसके आसपास होते भी हैं, लेकिन एक चलन आ गया है कि हमें जो कहना है, वह संक्षेप में कुछ शब्दों में किसी और संप्रेषण के माध्यम से कह देते हैं। कई बार सिर्फ एक शब्द में। ऐसा प्रतीत होता है, मानो घरों में रिश्तों को संभालती वे चिट्ठियां कहीं अतीत की अलमारियों में पड़ी वापस उन लकड़ियों में समा गई हैं, और कमरों में सिमटे घरों के वाईफाई सिग्नल टेक्स्ट मैसेज को फॉरवर्ड करते जा रहे हैं। कोई बात नहीं करना चाहता, अपनी खुशी या गम को बांटना तक नहीं चाहता।


वह कोलैबोरेशन कमजोर पड़ रहा है, यह और बात है कि फॉरवर्ड मैसेज और ई-मेल से इनबॉक्स भरा है। आज तमाम संस्थाएं इसी परेशानी से जूझ रही हैं कि विभिन विभागों के बीच आपस में लैटरल कोलैबोरेशन कैसे बढ़ाया जाए। टेक कंपनी एचपी के सह-संस्थापक बिल हैवलेट और डेविड पैकर्ड ने एचपी के माध्यम से दुनिया को यह बताया था कि एक लीडर को सिर्फ अपने चैंबर में नहीं रहना चाहिए, बल्कि सभी विभागों के सहकर्मियों से मिलते रहना चाहिए। मशहूर लेखक टॉम पीटर्स ने प्रबंधन की भाषा में इसे ‘मैनेजमेंट बाय वॉकिंग अराउंड’ कहा, जिससे कोलैबोरेशन और मजबूत हो। आखिरकार किसी परिवार, संस्था का एक मूल प्रयोजन होता है और संस्था के सभी सदस्य उस बुनियादी विजन से जुड़े होने चाहिए। तभी जाकर उस टीम भावना की अभिव्यक्ति होती है, जिससे मुश्किल कार्य सकारात्मकता से संपादित होते हैं। लेकिन उस विजन से जुड़ने के लिए सभी को सभी से जुड़े रहना भी होता है। लेकिन वह लैटरल कोलैबोरेशन ही कमजोर पड़ रहा है। घर में एक कमरे से दूसरे कमरे तक रिश्ते भले ही नहीं पहुंच रहे, मैसेज जरूर पहुंच जाते हैं। और ऑफिस में सिर्फ कुछेक मीटर दूर भी सहकर्मी बैठा नजर आ रहा हो, तो क्या हुआ? ई-मेल तो कर ही दिया जाता है।


हमारी रोजमर्रा की ज्यादातर बातें मानो एक लाइन के टेक्स्ट मैसेज में ही सिमट कर रह गई हैं। बोलना भी नहीं, लिखना भी नहीं, अब ज्यादातर संदेश का जवाब ‘थंब्स अप’ इमोजी  से दिया जाता है। कैपिटल ‘के’ ही अब जवाब बन गया है। ‘मोजो मोमेंट’ और ‘आई हैव अराइव्ड’ जैसे वायरल मोमेंट को बनाती यह दुनिया अपने ऑफिस या घर में उस लैटरल कोलैबोरेशन के साथ अभी नहीं पहुंच रही है। वह तो सिर्फ इतना कह देती है कि ‘आपने लगता है, मेल चेक ही नहीं किया।’ बस इतना कहना और जिम्मेदारी खत्म।


जिम्मेदारी मेल से शुरू होकर मेल पर ही सीसी और फॉरवर्ड होती रहती है, लेकिन उधर घर में तो कोई सीसी में नहीं लिया जाता। एक तरफ रिश्तों की वह साफगोई और भावपूर्ण अभिव्यक्ति उन मैसेज में छूटती नजर आ रही है, तो दूसरी तरफ किसी संस्था के सामूहिक उद्देश्य से तालमेल नहीं बैठ पाता। बस कह दिया जाता है, 'मेल चेक किया? मैंने तो भेज दिया था।' उधर एआई भी उस संप्रेषण की मुश्किलें अपनी तरह से बढ़ा रहा है और लिखित अभिव्यक्ति में पूरी तरह सेंध लगा चुका है। हर बीतते दिन मनुष्य से उसकी भावपूर्ण चिंतन और उस लिखित शब्दों के गलियारे को सूना करता जा रहा है। वह संप्रेषण को नहीं, लैटरल कोलैबोरेशन को नहीं, बल्कि इनबॉक्स को संभाल रहा है, ड्राफ्टिंग को बिना किसी मानसिक दबाव के दुरुस्त कर रहा है, ई-मेल के जवाब लिखने और समरी बनाने में लगा है।


कुछ नए एआई टूल्स इनबॉक्स को पूरी तरह से मैनेज करने की सुविधा देते हैं, जिससे इस टेक्नोलॉजी को लेकर प्राइवेसी से जुड़ी चिंताएं भी बढ़ जाती हैं। फिलहाल एआई ई-मेल से छुटकारा दिलाने के बजाय, ई-मेल से जुड़ी मुश्किलों को आसान बनाने का काम करते दिख रहा है। यह किसी कर्मचारी को आगे बढ़कर लैटरल कोलैबोरेशन का सुझाव तो नहीं दे रहा, लेकिन बातचीत के मुश्किल काम को आसान बनाने के तरीके जरूर सुझा रहा है। इसलिए क्यों नहीं, अपने संप्रेषण को कुछ और सहज बनाया जाए। टेक्स्ट और ई-मेल के साथ कभी फोन उठाकर या कुछ कदम चलकर बातचीत कर ली जाए और उस टॉल्सटॉय, उस कीट्स को याद किया जाए, जहां संप्रेषण के माध्यम पत्र भी हुआ करते थे। चिट्ठी लिखकर अपने सुख और दुख को बताया जाता था। हाथ से लिखे होने और किसी टेम्प्लेट या एआई से कॉपी न किए जाने के कारण, इन पत्रों में एक मौलिक व्यक्तित्व और आवाज होती थी, जो पत्र लिखने वाले के मूड और भावनाओं को दर्शाती थी। पढ़ने वाला भी उन विचारों का आनंद लेने के लिए समय निकालता था।


वर्जीनिया इवान्स के पत्रों पर आधारित पहले उपन्यास द कॉरेस्पोंडेंट  को इस साल का 'विमेंस प्राइज फॉर फिक्शन’ मिला है। यानी दुनिया के अंदर उस लैटरल कोलैबोरेशन को बढ़ाने के लिए ई-मेल, टेक्स्ट के साथ-साथ चिट्ठियों को लिखती वे पेंसिल, वे कलमें भी चाहिए, जो कीबोर्ड के वर्चस्व में गुम हो चुकी हैं। क्या आप इस लेख को पढ़कर फिर से अपने सपनों को कोई चिट्ठी लिखना चाहेंगे? अगर हां, तो बहुत अच्छा और अगर न तो कोई बात नहीं। कम से कम अपने चेयर से उठकर अपने सहकर्मी को यह तो बताएंगे ही कि मेल आपने भेजा है, क्योंकि आपका पहुंचना आपके सहकर्मी को वह अपनत्व देता है, जो लैटरल कोलैबोरेशन को बढ़ाता है। आप उस छूटते लैटरल कोलैबोरेशन को तो संभालना जरूर ही चाहेंगे। यह न भूलिए कि मेल और टेक्स्ट के पास अपने फोंट होते हैं, लेकिन आपकी हैंडराइटिंग नहीं होती। आखिर किरदार तो फॉरवर्ड नहीं हो सकते, वे तो उन शब्दों संग जिए जाते हैं। जिया फारूकी के शब्दों में वह चिंता भी है, पहले बहुत फासला था बाजार से घर का, अब एक ही कमरे में है बाजार भी, घर भी।  

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
Next