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एमएलसी चुनाव: नागपुर ने ही रखी कांग्रेस की लाज!

सार

नागपुर सीट जीतने के बाद कांग्रेस बीजेपी पर यह कहकर हमलावर है कि वह अपने सभी कोर नगरों जैसे कि वाराणसी, मथुरा और अयोध्या में चुनाव हार चुकी है। सीएम योगी के गृह क्षेत्र गोरखपुर में भी जैसे-तैसे जीती। नागपुर में बीजेपी की हार इसलिए भी अहम है, क्योंकि यह सीएम देवेन्द्र फडणवीस का गृह क्षेत्र और भाजपा की मातृसंस्था आरएसएस का मुख्यालय है।
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नागपुर स्नातक सीट पर कांग्रेस की जीत। - फोटो : Amarujala.com
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विस्तार
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देश के चार राज्यों की विधान परिषद ( लेजिस्लेटिव कौंसिल) की 28 सीटों के नतीजे यूं तो समूचे देश के राजनीतिक मूड को प्रतिबिम्बित नहीं करते, लेकिन धारणा और सियासी रणनीति के स्तर पर इनका महत्व जरूर है। खास बात यह है कि इन चुनावों में मतदाताओं ने बड़ी पार्टियों को तगड़ा झटका दिया है। ये पार्टियां अपनी हार से ज्यादा इस बात से खुश है कि प्रतिद्वंदवी पार्टी भी हार गई। जबकि यूपी में सपा और महाराष्ट्र में कांग्रेसनीत महाविकास आघाडी ने बेहतर प्रदर्शन किया।

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भाजपा नागपुर स्नातक सीट से हारी तो इसी नागपुर ने कांग्रेस की लाज रख ली। वरना पार्टी ने कांग्रेस शासित कर्नाटक में अपनी इकलौती सीट भी गवां दी थी। देश में एसआईआर और सीईसी ज्ञानेश कुमार के खिलाफ मोर्चा खोले बैठी कांग्रेस को केवल इसी सीट पर जीत मिली। जबकि ये चुनाव कांग्रेस की पुरानी मांग कि चुनाव ईवीएम की जगह बैलेट पेपर से हों, के जरिए हुए थे। 

नागपुर सीट जीतने के बाद कांग्रेस बीजेपी पर यह कहकर हमलावर है कि वह अपने सभी कोर नगरों जैसे कि वाराणसी, मथुरा और अयोध्या में चुनाव हार चुकी है। सीएम योगी के गृह क्षेत्र गोरखपुर में भी जैसे-तैसे जीती। नागपुर में बीजेपी की हार इसलिए भी अहम है, क्योंकि यह सीएम देवेन्द्र फडणवीस का गृह क्षेत्र और भाजपा की मातृसंस्था आरएसएस का मुख्यालय है।
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हालांकि पीएम मोदी ने कांग्रेस पर तंज किया कि वह ईवीएम से तो चुनाव हार ही रही थी, अब बैलेट पेपर में भी उसने मुंह की खाई है। इस तंज का साफ आशय यह था कि हार का ठीकरा ईवीएम पर फोड़ने की बजाए कांग्रेस पहले अपना घर ठीक करे और चुनाव प्रबंधन को मजबूत करे। एमएलसी चुनाव में कांग्रेस की दयनीय जीत जहां उत्तर प्रदेश में आसन्न विधानसभा चुनावों में सपा के साथ सीट बंटवारे में सौदेबाजी की उसकी ताकत को कमजोर करेगी, वहीं 1 नवंबर को दिल्ली में सीईसी ज्ञानेश कुमार को हटाने को लेकर आयोजित विपक्षी मार्च में पार्टी के तेवरों को ढीला कर सकती है।  

क्या रहे चुनाव के नतीजे?

समग्रता में इन नतीजों को देखें तो कुल 28 सीटों में से 16 सीटें तीन राज्यों में सत्तारूढ़ एनडीए ने जीतीं जबकि इंडिया ब्लॉक और निर्दलीयों ने बाकी की 12 सीटें जीतीं। इनमें सबसे अहम मुकाबला यूपी में था। वहां की 11 सीटों में से भाजपा ने 6 और मुख्य विपक्षी पार्टी समाजवादी पार्टी ने 5 सीटें जीत लीं। यहां सपा को पहले के मुकाबले 2 सीटों का फायदा हुआ।

जबकि भाजपा कुल सीटें तो पहले जितनी जीतने में कामयाब रही, लेकिन वह प्रधानमंत्री के संसदीय क्षेत्र वाराणसी में चुनाव हार गई। इन चुनाव नतीजों का आगामी विधानसभा चुनावों के संदर्भ आकलन किया जाए तो मानकर चलिए कि बीजेपी के लिए तीसरी बार सत्ता में लौटने की राह बहुत आसान नहीं रहने वाली है। 

यूपी के अलावा बाकी तीन राज्यों में एमएलसी चुनाव नतीजों का प्रतीकात्मक महत्व ज्यादा है, क्योंकि वहां तत्काल कोई बड़ा चुनाव नहीं है। दूसरा दिलचस्प नतीजा महाराष्ट्र का है, जहां कुल पांच विधान परिषद सीटों पर चुनाव हुए। इनमें भाजपा ने कांग्रेस से एक सीट छीन ली। लेकिन जो नागपुर स्नातक सीट उसके  पास थी, वो कांग्रेस के हाथों गवां दी। इसी तरह शरद पवार की एनसीपी ने भी दो सीट जीत लीं। एक शिवसेना को मिली। 

बिहार में चुनाव के परिणाम

बिहार में यूं तो सत्तारूढ़ एनडीए इस चुनाव में भी भारी पड़ा। वहां बीजेपी ने 3 सीटें जीतकर 1 सीट की वृद्धि की, वहीं उसकी सहयोगी जेडीयू ने प्रतिष्ठापूर्ण पटना सीट जीत ली। यानी कुल 8 में 4 एनडीए के खाते में गईं, जबकि एक जनसुराज पार्टी, 1 आरजेडी और दो निर्दलीयों को मिली। जीतने वाला एक ये निर्दलीय भी भाजपा का ही बागी है। कांग्रेस को सबसे बड़ा झटका उसके द्वारा शासित कर्नाटक में लगा, जहां विधान परिषद में उसकी इकलौती सीट भी भाजपा की सहयोगी जेडीएस ने छीन ली। जबकि भाजपा ने अपनी 3 सीटें बरकरार रखीं।

ये सभी चुनाव मत पत्र ( बैलेट पेपर) से हुए। जिसमें कांग्रेस अपनी पूर्व की 3 में से केवल 1 सीट बचा पाई। दूसरी तरफ इन एमएलसी चुनावों में भाजपा ने अपनी पहले की 11 सीटों में 2 का और इजाफा करते हुए 13 सीटें जीतीं। इसी तरह यूपी में सपा ने भी दो सीटें ज्यादा हासिल कीं। महाराष्ट्र में एनसीपी (शरद) ने भी अपनी एक सीट बढ़ाई है। कांग्रेस के अलावा अन्य विपक्षी पार्टियों को भी कोई न कोई सीट मिली है। राज्य में सत्तारूढ़ महायुति गठबंधन को दो सीटों पर ही संतोष करना पड़ा। 

वैसे कांग्रेस कर्नाटक में अपनी हार से चिंतित होने के बजाए नागपुर स्नातक सीट जीतकर ज्यादा खुश है। उसका मानना है कि यह भाजपा के मर्मस्थल पर उसकी जीत का ठप्पा है। वैसे विधान परिषद के चुनाव आम चुनावों से काफी अलग होते हैं। इनके निर्वाचन क्षेत्र भी और मतदाता सूचियां भी अलग होती हैं। ऐसे में इन नतीजों को पब्लिक मूड से जोड़ना सही नहीं होगा। मसलन कर्नाटक में अपनी एक मात्र सीट गंवाने के बाद वहां के मंत्री और कांग्रेस के राष्ट्रीय अध्यक्ष के पुत्र प्रियांक खरगे ने कहा कि नतीजे जनमत परिचायक नहीं है। हम 2028 के विधानसभा चुनाव में फिर वापसी करेंगे।

राज्य के सीएम डी. शिवकुमार ने कहा कि हम नतीजों की समीक्षा करेंगे। साथ में उन्होंने यह भी कहा कि इस हार के बाद भी कांग्रेस चुनाव बैलेट पेपर से कराने की मांग पर कायम रहेगी। वैसे कर्नाटक कांग्रेस में भीतरी घमासान जारी है। यह परिणाम भी उसीकी बानगी है। हालांकि वहां अंदरूनी कलह भाजपा में भी है, लेकिन लगता है कि इन चुनावों में उसे काफी हद तक मैनेज कर लिया गया।

बैलेट पेपर से चुनाव

एक अहम प्रश्न बैलेट पेपर से चुनाव कराने का है। चूंकि इसमें धांधलियों की गुंजाइश ज्यादा है, इसलिए तीन स्थानों पर गड़बडि़यां हुईं। फिर से मतदान कराना पड़ा। मतगणना और नतीजा घोषित करने में दो दिन का समय लगा। मतगणना की चरणवार घोषणा धीमी होने पर सपा नेता अखिलेश यादव ने आरोप लगाया कि चुनाव आयोग भाजपा की हार छुपाने के लिए जानबूझकर ऐसा कर रहा है। लेकिन यही आरोप तब भी लगाया जा सकता था, यदि चुनाव आयोग तेजी से मतगणना कराकर नतीजे घोषित कर देता। तब कहा जाता कि भाजपा को जिताने के लिए आयोग ऐसा कर रहा है। यानी चित भी मेरी और पट भी मेरी।

समग्रता में देखें तो आज मोबाइल और एआई के जमाने में बैलेट पेपर से चुनाव कराना ‘हवाई जहाज के रहते बैलगाड़ी से बंबई जाने’ जैसा है। अब मतदाताओंको भी आराम से उठने वाली पंगतों में खाने की आदत नहीं रही, बुफे का जमाना है। 

यही चुनाव अगर ईवीएम से होता तो उसी दिन शाम तक नतीजों की तस्वीर साफ हो जाती। चुनाव हारने वाली पार्टियों को छोड़ दें तो शायद ही कोई चाहेगा कि अब चुनाव तीन दशक पहले की तरह बैलेट पेपर से हों और नतीजे जानने का मानसिक दबाव चार-चार दिनों तक बना रहे। वैसे विदेशों में अभी भी बैलेट पेपर से चुनाव हो रहे हैं, जैसे कि इजराइल जैसे छोटे से देश के आम चुनाव नतीजे आने में पूरे दो दिन लग गए। लेकिन इससे नतीजे तो नहीं बदले। यूं भी जिस क्षेत्र में हम दुनिया में आगे हैं, वहां उलटी चाल चलने का क्या मतलब है?  

यहां एक बड़ा सवाल राज्यों में विधान परिषदों की उपयोगिता का है। देश के कुल 29 में से केवल 6 राज्यों में ही विधान परिषदें हैं। इनमें ज्यादातर बड़े राज्य ही हैं। लेकिन तमिलनाडु, पश्चिम बंगाल, मध्यप्रदेश और राजस्थान जैसे बड़े राज्यों में विधान परिषदें नहीं हैं और इनके न होने से कोई काम रूकता नहीं है। यह सही है कि केन्द्र में राज्य सभा की तर्ज पर राज्यों में द्विसदनीय व्यवस्था का प्रावधान संविधान की धारा 169/171 में है।

इसका मकसद यही था कि उच्च सदन के रूप में ये परिषदे सीधे निर्वाचित जन प्रतिनिधियों के काम पर नियंत्रण रखें। लेकिन कालांतर में विधान परिषदें केवल चुनाव लड़ने से बचने वाले या फिर हारे हुए नेताओं के सुरक्षित पुनर्वास की जगह बन गईं। 

कुछ राज्यों के मुख्यमंत्री तो विधान परिषद के सदस्य बनकर ही अपना कार्यकाल गुजार देते हैं। अब विधान परिषद का व्यावहारिक अर्थ केवल राजनीतिक तुष्टीकरण के तहत अपने आदमियों को एमएलसी बनाकर 6 साल के उपकृत करना भर रह गया है। चूंकि ये सदस्य सीधे जनता से निर्वाचित नहीं होते, इसलिए उनकी जनता के प्रति कोई खास जवाबदेही नहीं होती। जबकि विधान परिषद और उसके सदस्यों के खर्च का बोझ राज्य सरकार और प्रकारांतर से जनता पर ही पड़ता है। इसलिए इन चुनाव नतीजों के विश्लेषण से ज्यादा बहस तो इस बात पर होनी चाहिए कि विधान परिषदों को बनाए रखने का क्या औचित्य है?


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डिस्क्लेमर (अस्वीकरण): यह लेखक के निजी विचार हैं। आलेख में शामिल सूचना और तथ्यों की सटीकता, संपूर्णता के लिए अमर उजाला उत्तरदायी नहीं है। अपने विचार हमें blog@auw.co.in पर भेज सकते हैं। लेख के साथ संक्षिप्त परिचय और फोटो भी संलग्न करें।

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