एक दिन आप सोकर उठें और देखें कि आपके मोबाइल पर किसी ऐसे प्रियजन का वॉयस या वीडियो नोट उन्हीं के मोबाइल नंबर से मिले, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, तो आपको कैसा लगेगा? इंटरनेट आज एक वास्तविकता है, लेकिन किसी ने नहीं सोचा था कि यह मृत्यु के बाद भी हमारे जीवन से जुड़ा रहेगा। पढ़ने में यह थोड़ा अजीब लग सकता है, पर भारत में मृत व्यक्तियों के एआई अवतार बनाने और ‘ग्रीफ टेक’ (शोक तकनीक) का बाजार तेजी से फैल रहा है।
हाल ही में, अजमेर शहर के कपड़ा व्यापारी जयदीप शर्मा के विवाह रिसेप्शन में स्क्रीन पर उनके स्वर्गीय पिता प्रकट हुए। उन्होंने नए जोड़े को शुभकामनाएं और आशीर्वाद तो दिया ही, मौजूद मेहमानों से बात भी की। दरअसल, जयदीप ने स्थानीय टेक-क्रिएटर को खोजा था, जिसने उनके पिता की कुछ पुरानी तस्वीरों, पुराने वॉयस नोट्स और उनके व्यवहार के तौर-तरीकों का अध्ययन करके, एक मिनट का ‘एआई डीपफेक अवतार’ तैयार किया था। वैश्विक स्तर पर ‘हियरआफ्टर एआई’ और ‘स्टोरीफाइल’ जैसी कंपनियां अब बाकायदा इस ‘ग्रीफ टेक’ को एक बिजनेस मॉडल में बदल चुकी हैं। ये कंपनियां किसी व्यक्ति के पुराने चैट्स, वॉयस मैसेज और सोशल मीडिया डाटा के आधार पर उसका डिजिटल भूत या ‘घोस्ट बॉट’ तैयार कर रही हैं। भारत भी इस मामले में अपवाद नहीं है। प्रथम दृष्टया यह किसी भावुक परिवार का अपने दिवंगत प्रियजनों के प्रति प्रेम व तकनीकी चमत्कार लग सकता है, पर जहां भावनाएं तीव्र होती हैं, वहां बाजार सबसे पहले जड़ें जमाता है। ग्लोबल मार्केट रिसर्च फर्म ‘ग्रैंड व्यू रिसर्च’ की एक हालिया रिपोर्ट के अनुसार, भारत में ‘इंड-ऑफ-लाइफ प्लानिंग’ और ‘डिजिटल लीगेसी सर्विसेज’, जिसमें एआई अवतार और डिजिटल यादें सहेजना शामिल है, का बाजार तेजी से बढ़ रहा है।
मनोविज्ञान के अनुसार, किसी प्रियजन की मृत्यु के बाद ‘शोक मनाना’ एक बेहद जरूरी मानसिक और उपचारात्मक प्रक्रिया है। इन्सान पहले रोता है, तड़पता है, इन्कार की स्थिति से गुजरता है और अंत में उस शून्यता और सत्य को स्वीकार कर जीवन में आगे बढ़ता है। पर ‘ग्रीफ टेक’ इन्सान को शोक की इन्कार अवस्था में ही हमेशा के लिए अटका कर रख देती है।
जब आपके पास एक ऐसा घोस्ट बॉट या डिजिटल क्लोन हो, जो मृत व्यक्ति की तरह ही आपके व्हाट्सएप पर मैसेज कर सके, उसकी आवाज में फोन पर बात कर सके या वीडियो कॉल पर दिख सके, तो आपका मस्तिष्क कभी उसकी मृत्यु को स्वीकार नहीं कर पाएगा। ऐसे में, ग्रीफ टेक तकनीक इन्सान को एक अंतहीन अवसाद और ‘अवास्तविक दुनिया’ में धकेल सकती है। एआई मृत व्यक्ति को एक ‘इंटरैक्टिव प्रोडक्ट’ में बदल रही है, जिसे कुछ रुपये देकर कस्टमाइज किया जा सकता है। यह तकनीक अमरता का एक ऐसा भयावह छलावा दे रही है, जो वास्तव में मानवीय गरिमा को तहस-नहस कर सकती है।
क्या किसी मृत व्यक्ति के पुराने जीमेल, इंस्टाग्राम पोस्ट और व्हाट्सएप चैट्स को खंगालकर उसकी ‘डिजिटल आत्मा’ को फिर से बनाने का अधिकार उनके परिवार या टेक कंपनियों को होना चाहिए, यह बड़ा सवाल है। मौजूदा भारतीय कानूनी ढांचे में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है, जो किसी मृत व्यक्ति के ‘डिजिटल अवतार’ के निर्माण के लिए उसकी मरणोपरांत सहमति को अनिवार्य बनाता हो या यह स्पष्ट करता हो कि किन परिस्थितियों में ऐसा किया जा सकता है। यह स्थिति पहचान की चोरी और ब्लैकमेलिंग के रास्ते खोलती है। पश्चिमी देशों में ‘प्रोजेक्ट दिसंबर’ और ‘सीयांस एआई’ जैसी कंपनियां सस्ते में चैट लॉग्स के आधार पर मृतकों के टेक्स्ट बॉट बना रही हैं, जो चैटजीपीटी जैसे मॉडल्स पर चलता है और बॉट मृत व्यक्ति की स्टाइल में बात करता है। इनका उद्देश्य शोक में मदद करना है, पर इनसे उपजी चिंताएं ज्यादा गहरी हैं। कल को अगर ये कंपनियां दिवालिया हो जाएं या इस डाटा को किसी तीसरे पक्ष को बेच दें, तो मृत व्यक्ति की गरिमा और निजता का क्या होगा।
एआई बॉट असली व्यक्ति नहीं है। वह कभी गलत, बढ़ा-चढ़ाकर या अपमानजनक जवाब दे सकता है, बॉट को किसी और के द्वारा गलत इस्तेमाल किया जा सकता है, जिसमें मजाक, अश्लील कंटेंट, और राजनीतिक दुरुपयोग जैसे मुद्दे हो सकते हैं। इसलिए, स्मृतियां पुरानी तस्वीरों, संस्मरणों और दिलों में ही अच्छी लगती हैं न कि कोडिंग के जरिये कृत्रिम रूप से जिंदा किए गए ‘डिजिटल भूतों’ में।
हेजेन- यह एक एआई आधारित वीडियो बनाने वाला प्लेटफॉर्म है। इसकी मदद से उपयोगकर्ता केवल टेक्स्ट लिखकर असली जैसे दिखने वाले वीडियो बना सकते हैं। इसके लिए महंगे कैमरे, स्टूडियो या बड़े सेटअप की जरूरत नहीं पड़ती। यह खास तौर पर मार्केटिंग, सोशल मीडिया और पेशेवर कंटेंट बनाने में बहुत उपयोगी है। इसमें 100 से ज्यादा ऐसे डिजिटल इन्सानी अवतार मौजूद हैं, जो लिखी हुई स्क्रिप्ट को बिल्कुल इन्सानों की तरह बोलते हैं। यह किसी वीडियो का 175 से अधिक भाषाओं में अनुवाद भी कर सकता है और अनुवादित वीडियो बिल्कुल असली भी लगता है।