नीति आयोग के उपाध्यक्ष सुमन बेरी ने मंगलवार को कहा कि जलवायु पर होने वाली बहस में अब प्रतिस्पर्धा, लागत वहन करने की क्षमता और आर्थिक सुरक्षा जैसे पहलू प्रमुख हो गए हैं। उनका कहना था कि 2021 में ग्लासगो में आयोजित COP26 में नेट-जीरो उत्सर्जन को लेकर जो प्रतिबद्धता जताई गई थी, उसके बाद से वैश्विक हालात में बड़ा बदलाव आ चुका है। नेट जीरो का मतलब है कि किसी देश, कंपनी या अर्थव्यवस्था से जितनी ग्रीनहाउस गैसें (जैसे कार्बन डाइऑक्साइड) निकलती हैं, उतनी ही गैसें कम या संतुलित भी कर दी जाएं।
विकसित भारत व नेट-जीरो पर परिवहन, उद्योग और बिजली क्षेत्रों की सेक्टोरल रिपोर्ट्स के विमोचन कार्यक्रम में बेरी ने कहा कि 2026 तक आते-आते बहुत कुछ बदल गया है। नेट-जीरो को केवल उत्सर्जन घटाने के लक्ष्य के रूप में नहीं, बल्कि व्यापक आर्थिक और तकनीकी परिवर्तन के मार्गदर्शन के तौर पर देखना चाहिए।
उन्होंने भारत की जलवायु और ऊर्जा नीति में अधिक स्पष्टता की जरूरत पर जोर देते हुए टिनबर्गेन असाइनमेंट रूल का उल्लेख किया। बेरी ने याद दिलाया कि नोबेल पुरस्कार विजेता डच अर्थशास्त्री जान टिनबर्गेन के सिद्धांत के अनुसार, अगर सरकार के पास स्वतंत्र नीति लक्ष्य हैं, तो उन्हें हासिल करने के लिए स्वतंत्र नीति उपकरणों की आवश्यकता होती है।
ऊर्जा संक्रमण के संदर्भ में इस सिद्धांत को लागू करते हुए बेरी ने कहा कि भारत को यह स्पष्ट करना होगा कि उसकी राह केवल उत्सर्जन कटौती पर केंद्रित है या विकास-आधारित व्यापक संक्रमण पर। उन्होंने कहा कि हमारा लक्ष्य सिर्फ उत्सर्जन घटाना नहीं, बल्कि क्षमता निर्माण है, तो यह साफ होना चाहिए कि हम किस लक्ष्य को साध रहे हैं।
बेरी ने कहा कि अगर जलवायु नीति का मुख्य मकसद कार्बन उत्सर्जन घटाना है, तो सबसे सस्ते और असरदार उपायों को पहले अपनाया जाना चाहिए। उनके मुताबिक, इसके लिए किसी एक खास तकनीक पर अटकने के बजाय खुला और लचीला नजरिया रखना जरूरी है। उन्होंने यह भी चेतावनी दी कि ग्रीन हाइड्रोजन या कार्बन कैप्चर, यूटिलाइजेशन एंड स्टोरेज (CCUS) जैसे मिशनों पर ठोस सबूतों के बिना ज्यादा भरोसा करना सही नहीं है, क्योंकि जरूरी नहीं कि ये उपाय कम लागत में प्रदूषण घटाने वाले सबसे बेहतर विकल्प हों।