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बिहार: सोन के सैलाब में कैद ‘सुरौधा टापू’, नाव-मोमबत्ती के सहारे जिंदगी; 1500 लोग आज भी विकास की बाट जोह रहे

Sun, 13 Sep 2026 04:45 PM IST
पटना ब्यूरो न्यूज डेस्क, अमर उजाला भोजपुर

सार

भोजपुर के सुरौधा टापू पर रहने वाले करीब 1,500 लोग आज भी बिजली, सड़क, पेयजल और शिक्षा जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रहे हैं। बरसात में सोन नदी का जलस्तर बढ़ते ही टापू चारों तरफ से पानी से घिर जाता है और ग्रामीणों का मुख्य भूमि से संपर्क नाव के सहारे रह जाता है।
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सुरौधा टापू - फोटो : अमर उजाला
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विस्तार
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ये है भोजपुर जिले में स्थित सुरौधा टापू। चारो ओर पानी से घिरा हुआ है। इस टापू में बसे लोगों का जीवन अन्य लोगों की अपेक्षा थोड़ा अधिक चुनौतीपूर्ण होता है। यहां जिंदगी आज भी बुनियादी सुविधाओं के लिए संघर्ष कर रही है। लेकिन दशकों बाद भी समस्या उसी तरह है। किसी ने इस टापू की सुध नहीं ली।

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जिले के कोइलवर नगर पंचायत के वार्ड नंबर 11 में स्थित सुरौधा टापू पर रहने वाले लोगों के लिए हर साल बरसात नई मुसीबत लेकर आती है। सोन नदी का जलस्तर बढ़ते ही पूरा टापू चारों तरफ से पानी से घिर जाता है। करीब चार महीने तक पानी से घिरे रहने के कारण यहां के लोगों का मुख्य भूमि से संपर्क कट जाता है। आवागमन के लिए नाव ही एकमात्र सहारा रह जाती है। रोजमर्रा की जरूरतों का सामान खरीदने से लेकर इलाज, बच्चों की पढ़ाई और जरूरी काम के लिए ग्रामीणों को नाव के सहारे बिहटा अथवा कोइलवर की ओर जाना पड़ता है।

टापू पर 1,500 लोग रहते हैं
सुरौधा टापू पर करीब 120 घरों में एक हजार से अधिक, जबकि स्थानीय लोगों के अनुसार करीब 1,500 लोग रहते हैं। बाढ़ के दिनों में इन लोगों की जिंदगी पूरी तरह नाव पर निर्भर हो जाती है। टापू से बाहर निकलने के लिए कोई सीधा सड़क मार्ग नहीं है। सामान्य दिनों में लोग पैदल या बाइक से मुख्य मार्ग तक पहुंचते हैं, लेकिन बरसात में चारों तरफ पानी फैल जाने के बाद यह रास्ता भी बंद हो जाता है।

चार महीने तक पानी में घिरा रहता है टापू

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ग्रामीणों का कहना है कि बरसात के मौसम में सुरौधा टापू की स्थिति सबसे ज्यादा खराब हो जाती है। सोन नदी का पानी चारों तरफ फैल जाने से टापू पूरी तरह अलग-थलग पड़ जाता है। करीब चार महीने तक पानी रहने के कारण जरूरी सामान लेने के लिए भी नाव से बाहर जाना पड़ता है। बच्चों, महिलाओं और बुजुर्गों को नाव से यात्रा करना काफी मुश्किल भरा होता है।

बाढ़ के दौरान सबसे बड़ी चिंता गर्भवती महिलाओं और बीमार मरीजों को लेकर रहती है। अचानक किसी की तबीयत बिगड़ने या प्रसव पीड़ा शुरू होने पर उन्हें नाव के सहारे मुख्य भूमि तक लाना पड़ता है। ऐसे समय में नदी का बहाव और पानी का बढ़ा हुआ स्तर परिवारों की चिंता और बढ़ा देता है।

स्कूल नहीं, बाढ़ में बच्चों की पढ़ाई भी ठप
सुरौधा टापू पर आज तक कोई स्कूल नहीं बना है। यहां के बच्चे करीब चार किलोमीटर दूर स्थित स्कूल में पढ़ने जाते हैं। सामान्य दिनों में किसी तरह बच्चे स्कूल पहुंच जाते हैं, लेकिन बरसात में जब टापू चारों तरफ से पानी से घिर जाता है तो स्कूल जाना लगभग असंभव हो जाता है। नतीजा यह कि कई बच्चे महीनों तक स्कूल नहीं जा पाते और उनकी पढ़ाई बाधित होती रहती है।

स्थानीय महिलाओं का कहना है कि टापू पर स्कूल और सड़क की सुविधा होती तो बच्चों को इस तरह पढ़ाई से वंचित नहीं होना पड़ता। गांव के बच्चे भी बताते हैं कि वे पढ़ाई करने के लिए स्कूल नहीं जाते, क्योंकि छोटे बच्चे उतनी दूर स्कूल नहीं जा पाएंगे और बड़े बच्चे बरसात के दिनों में पानी भर जाने के कारण स्कूल नहीं जा पाते हैं। बरसात के दिनों में बच्चों को पानी के बीच नाव से बाहर भेजना भी अभिभावकों के लिए जोखिम भरा होता है।

आज भी बिजली और पेयजल का इंतजार
सुरौधा टापू की सबसे बड़ी समस्या केवल बाढ़ और आवागमन की नहीं है। आज भी यहां बिजली और स्वच्छ पेयजल जैसी बुनियादी सुविधाओं का अभाव है। डिजिटल इंडिया के दौर में टापू के लोग मोमबत्ती की रोशनी में जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं। स्थानीय निवासी प्रभु राय और बीरेंद्र राय बताते हैं कि अब तो केरोसिन भी नहीं मिलता है। ऐसे में मोमबत्ती और रिचार्ज वाली लाइट के सहारे घरों में रोशनी की जाती है। बिजली नहीं होने के कारण मोबाइल और रिचार्ज लाइट चार्ज करने के लिए भी ग्रामीणों को कोइलवर जाना पड़ता है। इसके लिए उन्हें प्रति मोबाइल करीब 10 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं।

ननकी देवी बताती हैं कि बिजली नहीं होने के कारण सूर्यास्त के बाद घर के जरूरी काम निपटाने में भी परेशानी होती है। बच्चों की पढ़ाई भी प्रभावित होती है। बच्चे दीये और मोमबत्ती की रोशनी में पढ़ने को मजबूर हैं।

सात साल पहले सोलर प्लेट से जगी थी उम्मीद
सुरौधा टापू के लोगों को करीब सात वर्ष पहले बिजली की समस्या से निजात मिलने की उम्मीद जगी थी। तत्कालीन जिलाधिकारी संजीव कुमार के प्रयास से टापू पर सोलर प्लेट लगाए गए थे। करीब 150 घरों में एलईडी बल्ब और पंखे के लिए कनेक्शन दिया गया था।

इसी सौर ऊर्जा से जलापूर्ति की व्यवस्था भी की गई थी और कई घरों तक पेयजल पहुंचाया गया था, लेकिन नियमित रखरखाव और मेंटेनेंस के अभाव में यह व्यवस्था करीब एक वर्ष के भीतर ही खराब हो गई। इसके बाद धीरे-धीरे सोलर सिस्टम और जलापूर्ति दोनों बंद हो गए। तत्कालीन डीएम के तबादले के बाद व्यवस्था को संभालने वाला कोई नहीं रहा और लोगों की उम्मीद भी टूटती चली गई।

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चुनाव में वादे, फिर पांच साल तक इंतजार
ग्रामीणों का कहना है कि चुनाव के समय नेताओं और उनके प्रतिनिधियों का टापू पर आना-जाना बढ़ जाता है। बिजली, पानी, सड़क और अन्य मूलभूत सुविधाएं उपलब्ध कराने के वादे किए जाते हैं, लेकिन चुनाव खत्म होते ही ये वादे भी खत्म हो जाते हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि आजादी के दशकों बाद भी किसी सरकार या जनप्रतिनिधि ने उनकी स्थायी समस्या का समाधान नहीं किया।

सुरौधा टापू के लोग आज भी इस उम्मीद में हैं कि किसी दिन विकास की रोशनी उनके घरों तक पहुंचेगी। फिलहाल सोन के पानी से घिरे इस टापू पर जिंदगी नाव, मोमबत्ती और उम्मीद के सहारे चल रही है।

क्या कहते हैं चेयरमैन
नगर पंचायत कोईलवर के चेयरमैन सरताज आलम ने बताया कि सुरौधा टापू पर पेयजल, बिजली और सड़क के लिए स्थानीय विधायक को पत्र दिया गया है। बरसात खत्म होने के बाद विधायक ने आश्वासन दिया है कि वहां मूलभूत सुविधाएं मुहैया कराई जाएंगी।

 

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