फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
विज्ञापन

Vehicle Value: शोरूम से बाहर आते ही क्यों घटती है नई कार की कीमत? जानें लाखों की गाड़ी कैसे बनती है सेकंड हैंड

Thu, 18 Jun 2026 08:00 AM IST
Jagriti ऑटो डेस्क, अमर उजाला, नई दिल्ली

सार

Car Depreciation: नई कार खरीदना हर व्यक्ति का सपना होता है, लेकिन क्या आप जानते हैं कि शोरूम से बाहर निकलते ही उसकी कीमत कम होने लगती है? आखिर ऐसा क्यों होता है और किन वजहों से कार की वैल्यू  तेजी से घटती है ? 
 
Register For Event
विज्ञापन
car new - फोटो : freepik
विज्ञापन

विस्तार
वॉट्सऐप चैनल फॉलो करें

New Car Value: मध्ययम-वर्गीय परिवार में कार किसी सपने या किसी स्टेटस से कम नहीं मानी जाती और कार अगर पहली हो, तो उसकी खुशी ही अलग होती है। लेकिन कार खरीदते समय एक ऐसा सच है, जो शायद ही कुछ लोग जानते हैं। दरअसल, जिस कार को आप लाखों रुपये खर्च कर खरीदते हैं, उसकी कीमत शोरूम से बाहर निकलते ही कम होने लगती है। यही वजह है कि कुछ समय बाद वही कार सेकंड हैंड वाहन की श्रेणी में आ जाती है। आइए जानते हैं कि आखिर ऐसा क्यों होता है और कौन-कौन से फैक्टर कार की कीमत को प्रभावित करते हैं।

विज्ञापन


कार डिप्रिसिएशन क्या होता है ?
ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री में किसी वाहन की कीमत समय के साथ कम होने की प्रक्रिया को डिप्रिसिएशन कहा जाता है।  इसे और आसानी से समझें तो जैसे-जैसे कार पुरानी होती जाती है, उसकी बाजार कीमत घटती जाती है। यह प्रक्रिया लगभग हर कार पर लागू होती है, चाहे वह बजट कार हो या लग्जरी मॉडल। फर्क सिर्फ इतना होता है कि अलग-अलग वाहनों में कीमत घटने की गति अलग हो सकती है।

शोरूम से बाहर निकलते ही क्यों कम हो जाती है कीमत?
जब तक कार शोरूम में खड़ी रहती है, उसे पूरी तरह नई माना जाता है, लेकिन जैसे ही उसकी डिलीवरी हो जाती है और उसका रजिस्ट्रेशन हो जाता है, वह तकनीकी रूप से यूज्ड कार की श्रेणी में आ जाती है। भले ही कार कुछ किलोमीटर ही चली हो, लेकिन बाजार में उसकी पहचान अब नई कार की नहीं रहती। इसी वजह से उसकी कीमत में गिरावट शुरू हो जाती है।
विज्ञापन


इन खर्चों की वजह से भी घटती है वैल्यू
कार खरीदते समय ग्राहक केवल वाहन की कीमत ही नहीं चुकाता, बल्कि कई अन्य शुल्क भी देता है। इनमें रजिस्ट्रेशन फीस, रोड टैक्स, इंश्योरेंस प्रीमियम और हैंडलिंग व अन्य चार्ज शामिल है।
जब वाहन को दोबारा बेचा जाता है, तब खरीदार इन अतिरिक्त खर्चों का भुगतान नहीं करता। वह केवल कार की मौजूदा स्थिति और बाजार कीमत को देखकर सौदा करता है। यही वजह है कि मालिक को इन खर्चों की भरपाई नहीं मिलती।

पहले साल में सबसे ज्यादा गिरती है कीमत
एक्सपर्ट्स के अनुसार, नई कार अपने पहले साल में ही लगभग 15 से 25 प्रतिशत तक मूल्य खो सकती है। कुछ मॉडलों में यह गिरावट और भी ज्यादा देखने को मिलती है।
यही वजह है कि कई लोग नई कार खरीदने के बजाय कम चली हुई सेकंड हैंड कार खरीदना पसंद करते हैं, क्योंकि उन्हें अपेक्षाकृत कम कीमत में बेहतर वाहन मिल जाता है।

रीसेल वैल्यू किन बातों पर निर्भर करती है?

किसी कार की दोबारा बिक्री की कीमत केवल उसकी उम्र से तय नहीं होती। कई अन्य कारक भी इसमें अहम भूमिका निभाते हैं।

1. बाजार में मांग: अगर किसी मॉडल की बाजार में मांग ज्यादा है, तो उसकी रीसेल वैल्यू बेहतर रहती है।

2. सर्विस रिकॉर्ड: समय पर सर्विस कराई गई कारें खरीदारों को ज्यादा आकर्षित करती हैं।

3. माइलेज और कंडीशन: कम चली हुई और अच्छी स्थिति में मौजूद कार की कीमत अधिक मिल सकती है।

4. एक्सीडेंट हिस्ट्री: अगर वाहन किसी बड़े हादसे का शिकार रहा है, तो उसकी कीमत पर सीधा असर पड़ता है।

5. कुल चली हुई दूरी: ओडोमीटर पर अधिक किलोमीटर दिखने से वाहन की वैल्यू कम हो सकती है।

नया मॉडल आते ही क्यों घट जाती है पुराने मॉडल की कीमत?
ऑटोमोबाइल कंपनियां समय-समय पर फेसलिफ्ट और नए मॉडल लॉन्च करती रहती हैं। जब किसी कार का नया वर्जन बाजार में आता है, तो पुराने मॉडल की मांग कम होने लगती है। इसका सीधा असर उसकी रीसेल वैल्यू पर पड़ता है और बाजार में उसकी कीमत पहले के मुकाबले घट जाती है।

क्या सेकंड हैंड कार खरीदना फायदे का सौदा हो सकता है?
कई मामलों में कम चली हुई सेकंड हैंड कार खरीदना समझदारी भरा फैसला साबित हो सकता है। क्योंकि शुरुआती डिप्रिसिएशन का बड़ा हिस्सा पहले मालिक द्वारा वहन किया जा चुका होता है। ऐसे में खरीदार को अपेक्षाकृत कम कीमत में अच्छी कार मिल सकती है।

विज्ञापन
विज्ञापन
Next
AU ऐप में पढ़ें